नवभारत विशेष: जज वर्मा को जांच पैनल ने माना दोषी, संसद में रिपोर्ट आते ही दिया इस्तीफा; CBI जांच की मांग तेज

Justice Verma Case: संसद में पेश जांच रिपोर्ट में दोषी ठहराए जाने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है। उन पर अधजले नोट गायब करने का आरोप है और अब CBI जांच की मांग तेज हो गई है।
Photo of Judge Yashwant Verma involved in Allahabad High Court cash scandal
जज यशवंत वर्मा डिजाइन फोटो
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High Court Judge Cash Scandal: उच्च न्यायपालिका का ऐसे गंभीर व चिंताजनक विवाद में लिप्त होना दुर्लभ था। हालांकि न्यायाधीश वर्मा के बचाव में तर्क था कि स्टोररूम पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की मांग थी कि घटना व आरोपों की गहन जांच की जाए, इसलिए 3 न्यायाधीशों का एक जांच पैनल गठित किया गया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में 10 दिन, 55 गवाह, अनेक बैठकों व घटनास्थल का मौका मुआयना करने के बाद न्यायाधीश वर्मा के इस बचाव तर्क को खारिज कर दिया था कि उनके आधिकारिक निवास के स्टोररूम पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था।

संसद में मामला पहुंचते ही जांच कमीटी की नियुक्ति

जब यह मामला संसद में पहुंचा तो लोकसभा के स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरविंद कुमार के नेतृत्व में एक जांच कमेटी नियुक्त की। इस कमेटी की रिपोर्ट को 12 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया गया, जिसमें न्यायाधीश वर्मा को दोषी मानते हुए अतिरिक्त कार्रवाई की सिफारिश की गई है। क्योंकि यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि स्टोररूम से नोट गायब कैसे हुए और न्यायाधीश वर्मा विशाल मात्रा में नोटों की 'मौजूदगी, स्रोत या मालिकाना अधिकार' को बताने में नाकाम रहे।

जब उन्हें लगा कि संसद उन्हें उनके पद से हटा देगी, तो उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था, जहां नोट विवाद के बाद उनका ट्रांसफर कर दिया गया था।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग

कमेटी ने न्यायाधीश वर्मा के खिलाफ 'एक्शन' लेने की सिफारिश अवश्य की है, लेकिन क्या एक्शन लिया जाएगा? यह स्पष्ट नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत एक न्यायाधीश पदासीन नहीं माना जाता है, अगर वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना हस्तलिखित त्यागपत्र प्रेषित कर देता है। दरअसल, संसद को चाहिए कि वह न सिर्फ CBI द्वारा जांच कराए कि विशाल मात्रा में पैसा कहां से आया, क्यों आया व यह किसका था, बल्कि न्यायाधीश वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत मुकदमा भी दर्ज होना चाहिए।

घरेलू सेवकों के जरिए साक्ष्य मिटाने का आरोप

यह मामूली मामला नहीं है, अगर न्यायाधीश ही भ्रष्टाचार के संदेह में होंगें, तो आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा ? 3 न्यायाधीशों के जांच पैनल ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि न्यायाधीश वर्मा के आधिकारिक निवास के स्टोररूम में जो बोरियों में भरे हुए बड़ी मात्रा में बेहिसाब अधजले रुपये थे, उन्हें दमकल व पुलिस विभाग के कर्मचारियों के घटनास्थल से जाने के बाद न्यायाधीश वर्मा से बात करके उनके निजी सचिव की निगरानी में उनके अति विश्वसनीय घरेलू सेवकों ने वहां से हटाया था, यह साक्ष्यों को मिटाना हुआ।

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इससे यह भी साबित होता है कि न्यायाधीश वर्मा का अपने आधिकारिक निवास के स्टोररूम पर पूर्ण नियंत्रण था और उनके व उनके परिवार के सदस्यों की अनुमति के बिना उनके आधिकारिक निवास में कोई प्रवेश नहीं कर सकता था।

कांग्रेस ने कहा है कि यह जानना महत्वपूर्ण है कि पैसा किसका था और न्यायाधीश को क्यों दिया गया था? इस सवाल का जवाब आना अभी शेष है और यही इस केस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। जब हर जांच में न्यायाधीश वर्मा 'दोषी' पाए गए हैं, तो वह आजाद क्यों घूम रहे हैं?

-लेख नौशाबा परवीन द्वारा

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