Hindi news, हिंदी न्यूज़, Hindi Samachar, हिंदी समाचार, Latest Hindi News
X
  • देश
  • महाराष्ट्र
  • विदेश
  • खेल
  • मनोरंजन
  • नवभारत विशेष
  • वायरल
  • धर्म
  • लाइफ़स्टाइल
  • बिज़नेस
  • करियर
  • टेक्नॉलजी
  • यूटिलिटी न्यूज़
  • फैक्ट चेक
  • हेल्थ
  • ऑटोमोबाइल
  • वीडियो

  • वेब स्टोरीज
  • फोटो
  • होम
  • विडियो
  • फटाफट खबरें

नवभारत विशेष: वैज्ञानिक सैंपल सर्वे का विकल्प नहीं, असमानताओं की करनी होगी सही पहचान

जाति जनगणना से न सिर्फ यह मालूम होगा कि किस जाति की कितनी संख्या है, बल्कि यह भी जानकारी मिलेगी कि वह किन आर्थिक व सामाजिक स्थितियों में अपना जीवन व्यतीत कर रही है।यह पहचान स्थापित करना नहीं है असमानताओं को पहचानना है।

  • By दीपिका पाल
Updated On: May 05, 2025 | 01:36 PM

वैज्ञानिक सैंपल सर्वे का विकल्प नहीं (सौ. डिजाइन फोटो)

Follow Us
Close
Follow Us:

नवभारत डिजिटल डेस्क: भारत में धर्म अस्थायी है, जाति स्थायी है।व्यक्ति धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं बदल सकता।इस्लाम में भी त्यागी, राजपूत, जाट, गुर्जर, दलित आदि जातियां हैं।जातियों में भी उप-जातियां हैं।मसलन, अंसारी (जुलाहे) बिरादरी में तीन उप-जातियां हैं- थमैती, पारवे और देसवाले।यह उप-जातियां आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखती हैं।इनमें जो आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक व राजनीतिक असमानताएं हैं, वह जगजाहिर हैं।यह हाल मुस्लिमों की लगभग सभी जातियों का है।लेकिन ठोस डाटा का अभाव है।

इसलिए आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जो जाति जनगणना (मुस्लिमों की जातिगत जनगणना सहित) को शामिल किया गया है, वह स्वागतयोग्य कदम है।इससे मुस्लिम जातियों की वास्तविक स्थिति भी मालूम हो जाएगी और डाटा की रोशनी में उनके विकास के लिए भी उचित कदम उठाए जा सकेंगे।हालांकि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने मुस्लिमों की दयनीय स्थिति को उजागर कर दिया था, लेकिन उन्हें आरक्षण जैसी सुविधाओं से इसलिए वंचित रखा गया, क्योंकि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने का भारत में धर्म अस्थायी है, जाति स्थायी है।

व्यक्ति धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं बदल सकता।इस्लाम में भी त्यागी, राजपूत, जाट, गुर्जर, दलित आदि जातियां हैं।जातियों में भी उप-जातियां हैं।मसलन, अंसारी (जुलाहे) बिरादरी में तीन उप-जातियां हैं- थमैती, पारवे और देसवाले।यह उप-जातियां आपस में रोटी-बेटी का रिश्ता नहीं रखती हैं।इनमें जो आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक व राजनीतिक असमानताएं हैं, वह जगजाहिर हैं।यह हाल मुस्लिमों की लगभग सभी जातियों का है।लेकिन ठोस डाटा का अभाव है।इसलिए आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जो जाति जनगणना (मुस्लिमों की जातिगत जनगणना सहित) को शामिल किया गया है, वह स्वागतयोग्य कदम है।इससे मुस्लिम जातियों की वास्तविक स्थिति भी मालूम हो जाएगी और डाटा की रोशनी में उनके विकास के लिए भी उचित कदम उठाए जा सकेंगे।

मुस्लिमों में भी जातिभेद

बहरहाल, मुस्लिमों में जो संपन्न अशरफ जातियां हैं (सैयद, शेख, मुगल, पठान आदि) वह अब भी अपने राजनीतिक वर्चस्व को खोना नहीं चाहतीं।उनकी तरफ से यह मुहिम चलाई जा रही है कि जनगणना में धर्म इस्लाम व जाति मुस्लिम लिखवायी जाए।यह हकीकत से मुंह छुपाना है।मुस्लिम कोई जाति नहीं है।जो भी इस्लाम को मानता है, वह मुस्लिम है।भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिमों में जातियों का होना एक सामाजिक सच्चाई है।अगर सवर्ण मुस्लिमों ने एसएसएमपी (सैयद, शेख, मुगल, पठान) पार्टी बनायी हुई है, तो ओबीसी मुस्लिमों के पसमांदा संगठन हैं।यह जातिगत झुकाव चुनावी मतदान में भी नजर आता है।

यही वजह है कि बीजेपी की दिलचस्पी पसमांदा में बढ़ती जा रही है और उसने इस सिलसिले में अनेक सम्मेलन आयोजित किए हैं।हमने जीडीपी विकास।डिजिटाइजेशन व ग्लोबल प्रतिस्पर्धा का तो पीछा किया, लेकिन जाति को अक्सर अनदेखा किया, जबकि जाति एक ऐसी संरचना है, जो शिक्षा, रोजगार, हेल्थकेयर, हाउसिंग व न्याय को आकार दे रही है।हम डाटा को लिंग, भूगोल व आयु के आधार पर विभाजित करते हैं।लेकिन सांख्यिकीय की दृष्टि से जाति अनदेखी ही रही है।

असमानताओं को पहचानना होगा

जाति जनगणना से न सिर्फ यह मालूम होगा कि किस जाति की कितनी संख्या है, बल्कि यह भी जानकारी मिलेगी कि वह किन आर्थिक व सामाजिक स्थितियों में अपना जीवन व्यतीत कर रही है।यह पहचान स्थापित करना नहीं है, बल्कि असमानताओं को पहचानना है।यह समझना भी आवश्यक है कि जनगणना वैज्ञानिक सैंपल सर्वे का विकल्प नहीं है।जनगणना से दायरा मिलता है, गहराई नहीं।यह डाटा जब एकत्र हो जाए, तब गहरे आवश्यकता-आधारित अध्ययनों की जरुरत होगी।

नवभारत विशेष से जुड़े सभी रोचक आर्टिकल्स पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस या स्वतंत्र शोध संस्थाओं द्वारा फोकस सर्वे कराने होंगे, ताकि क्षेत्रीय, समुदाय-विशिष्ट आदि असमानताएं मालूम हो सकें।इस किस्म के डाटा से ही सही जाति-आधारित कल्याणकारी योजनाएं और आरक्षण नीतियां बन सकती हैं।विश्वसनीय साक्ष्य हाथ में होंगें, तो नीतिनिर्माता जान सकेंगे कि योजनाओं का लाभ हाशिए पर पड़े लोगों तक पहुंच रहा है या केवल प्रशासनिक श्रेणियों की ही सेवा हो रही है।इससे ही विकास का अधिक समावेशी व स्थायी मॉडल तैयार हो सकेगा।

लेख- शाहिद ए चौधरी के द्वारा

Inequalities will have to be correctly identified in the census

Get Latest   Hindi News ,  Maharashtra News ,  Entertainment News ,  Election News ,  Business News ,  Tech ,  Auto ,  Career and  Religion News  only on Navbharatlive.com

Published On: May 05, 2025 | 01:36 PM

Topics:  

  • Caste Census
  • Census
  • India

सम्बंधित ख़बरें

1

‘खान गैंग गद्दार है…’, साध्वी प्राची के विवादित बयान पर मौलाना का पलटवार- VIDEO

2

‘आतंक फैलाओगे…तो चुप नहीं बैठेगा भारत’, पाकिस्तान पर बरसे जयशंकर, कहा- हमें आत्मरक्षा का पूरा हक

3

इस साल 6 जगहों पर छिड़ सकती है जंग, वर्चस्व साबित करने में जुटे इतने देश

4

चेनाब पर भारत के पनबिजली परियोजना से पाकिस्तान में हड़कंप…सिंधु जल समझौते की देने लगा दुहाई

Popular Section

  • देश
  • विदेश
  • खेल
  • लाइफ़स्टाइल
  • बिज़नेस
  • वेब स्टोरीज़

States

  • महाराष्ट्र
  • उत्तर प्रदेश
  • मध्यप्रदेश
  • दिल्ली NCR
  • बिहार

Maharashtra Cities

  • मुंबई
  • पुणे
  • नागपुर
  • ठाणे
  • नासिक
  • अकोला
  • वर्धा
  • चंद्रपुर

More

  • वायरल
  • करियर
  • ऑटो
  • टेक
  • धर्म
  • वीडियो

Follow Us On

Contact Us About Us Disclaimer Privacy Policy Terms & Conditions Author
Marathi News Epaper Hindi Epaper Marathi RSS Sitemap

© Copyright Navbharatlive 2026 All rights reserved.