

National Judicial Commission Proposal: उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों ने भी कई बार भारत के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर विशेष रूप से राजनेताओं की ओर से पड़ने वाले दबाव और प्रभाव के बारे में बताया है। न्यायाधीशों के लिए अगर खुद को किसी मामले से अलग करने का कारण बताना अनिवार्य कर दिया जाए, तो उन पर पड़ने वाले दबाव और प्रभाव को रोका जा सकेगा। अदालतें कभी-कभी सैकड़ों या हजारों पृष्ठों तक के बहुत लंबे फैसले सुनाती हैं, जिन्हें व्यावहारिक रूप से वादी स्वयं भी नहीं पढ़ते। आम तौर पर ऐसे लंबे अदालती फैसले पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने वाली सामग्री बनकर रह जाते हैं और उन्हें केवल शोधकर्ताओं तथा कुछ चुनिंदा वकीलों द्वारा ही पढ़ा जाता है।
भारत को उन देशों की व्यवस्था अपनानी चाहिए, जहां अदालती फैसलों के पृष्ठों की संख्या की एक सीमा निर्धारित है और यह सीमा सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों तथा ट्रायल कोर्ट के लिए अलग-अलग है। प्रत्येक 50 पृष्ठ से अधिक लंबे अदालती फैसले के साथ अनिवार्य रूप से उसका एक संक्षिप्त संस्करण भी जारी किया जा सकता है। सभी फैसले सुनवाई पूरी होने के एक महीने के भीतर सुनाए जाने चाहिए। उदारतापूर्वक दिए जाने वाले एकपक्षीय स्थगनादेश, अदालतों में मामलों के लगातार बढ़ते भारी लंबित बोझ का मुख्य कारण है। 'न्याय में देरी, न्याय से वंचित करना है।'
अदालतों में लंबी ग्रीष्मकालीन छुट्टियों की व्यवस्था तत्कालीन ब्रिटिश शासकों द्वारा इसलिए बनाई गई थी ताकि अंग्रेज जजों को अपने गृहदेश इंग्लैंड जाने की सुविधा भी मिल सके। विधि आयोग की अदालतों की लंबी ग्रीष्मकालीन छुट्टियों की व्यवस्था भी समाप्त कर देनी चाहिए, कुछ उच्च न्यायालयों के नाम अब भी उन शहरों के नाम पर हैं, जहां वे स्थित हैं। बॉम्बे, मद्रास और इलाहाबाद का बहुत पहले ही क्रमशः मुंबई, चेन्नई और प्रयाग के रूप में नाम बदल दिया गया है।
व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि शहरों के नाम बदलने के साथ उच्च न्यायालयों के नाम भी स्वयं बदल जाएं। सबसे अच्छा यह होगा कि सभी उच्च न्यायालयों के नाम शहरों के बजाय राज्यों के नाम पररखकर ब्रिटिश विरासत को समाप्त किया जाए। उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति का अधिकार विधायिका के राजनीतिक हाथों में सौंपना भी उचित नहीं हो सकता।
एक संतुलित दृष्टिकोण एक शक्तिशाली राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना करके हासिल किया जा सकता है, जिसमें सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सदस्य हों तथा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्षी दल के नेता, भारत के मुख्य न्यायाधीश और भारतीय बार काउंसिल द्वारा नामित सदस्य हों।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर 65 वर्ष की जानी चाहिए, ताकि इसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु के बराबर किया जा सके। भविष्य के लिए ऐसे सुधार किए जा सकते हैं, जिनके तहत भारतीय न्यायिक सेवा की स्थापना भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर की जाए। राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले किसी भी व्यक्ति को न्यायाधीश नियुक्त न किया जाए। किसी भी न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति के 2 वर्ष बाद कहीं भी कोई पद नहीं दिया जाना चाहिए।
-लेख सुभाष चंद्र अग्रवाल द्वारा