(डिजाइन फोटो)
देश में इस्लामी आतंक पैठ बनाता जा रहा है। पखवाड़े भर के भीतर ही दो सुबूत मिले। पहले तो दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस से जुड़े रिजवान अली को धर दबोचा और फिर उसने झारखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से काम कर रहे अल-कायदा के आतंकवादी मॉड्यूल को पकड़ लिया। सरगना समेत 14 लोगों को हिरासत में ले पूछताछ करने से पता चला कि कई राज्यों में भिन्न आतंकी संगठन सक्रिय हैं।
पीपुल्स फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई और सिमी पर बैन है। लेकिन कई खुलासे बताते हैं कि यह दूसरे नामों से सक्रिय हैं। हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, केरल और महाराष्ट्र समेत अनेक राज्यों की अदालतें इस्लामिक स्टेट से संबद्ध कई आतंकियों को पिछले कुछ वर्षों में सजा सुना चुकी हैं और अलकायदा यहां जड़ जमाने की कोशिश में है।
पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान से लेकर बाजौर तक आईएसआईएस के कई ट्रेनिंग कैंप संचालित करती है। वह अपने लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को आईएसआईएस में भर्ती करवा कर इस्लामिक स्टेट का रुख इधर मोड़ना चाहती है। कुछ बरस पहले तक यह मान जाता था कि देश में आतंकवाद सीमा पार से पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित और उसके संगठनों द्वारा अंजाम दिया गया कृत्य है पर अब यह अंतरराष्ट्रीय हो चुका है। अब इसमें कई देशों के आतंकी संगठन शामिल हैं।
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इस्लामी आतंकी संगठन हर ओर पांव पसारता जा रहा है। 20 से ज्यादा राज्यों और 120 से ज्यादा शहरों में इनकी पहुंच बन चुकी है। न सिर्फ अलकायदा और आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन देश के तमाम राज्यों में अपना नेटवर्क फैला रहे हैं बल्कि कई दूसरे चरमपंथी संगठन देश के तमाम क्षेत्रों में सक्रिय हैं जो खुफिया निगरानी के बाद सामने आ सकते हैं।
खुफिया तंत्र बताते हैं कि परिस्थितियां बदल गई हैं। अल कायदा यहां अपने को मजबूत बनाने में लगा है और देश के कुछ मुसलमान आज इस्लामिक स्टेट की ओर आकर्षित दिखते हैं। आईएस देश में जिहाद छेड़ने के अलावा भारतीय मुसलमानों को इराक और सीरिया में लड़ने को मजबूर करेगा जिससे उनका कोई वास्ता नहीं। इनमें से कुछ गजवा-ए-हिन्द की बात करते हैं यानी अधिक से अधिक काफिरों को मारना, तो कुछ लोकतांत्रिक तरीके से भारत को इस्लामी मुल्क बनाने की।
ये चाहते हैं कि 2047 में जब देश आजादी के 100 साल मना रहा हो, तब तक भारत को इस्लामिक देश घोषित करवा लें। वे दावा करते हैं कि दस फीसदी मुस्लिम भी साथ दें, तो काफिरों को घुटनों पर ला देंगे। इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पीस द्वारा प्रकाशित सूची में आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित दस देशों में भारत का शुमार किया जाता है।
हमें स्थानीय आतंकवाद और सीमा पार से प्रायोजित आतंक से समान रूप से निपटने का तंत्र विकसित करना होगा। ऑनलाइन आतंकवाद से निपटने के लिए सक्षम लोगों को साथ लेकर सुरक्षा का पुख्ता इकोसिस्टम तैयार करना होगा। बहुसंख्यकवाद की अंधाधुंध राजनीति सत्ता तो दिला सकती है लेकिन इस सांसत में भी फंसा सकती है। अल्पसंख्यकों में सुरक्षा भाव नहीं बढाया गया तो इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को मुस्लिम नौजवानों को रिझाने का मौका मिल जाएगा भारतीय मुसलमानों ने इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को हमेशा खारिज किया है।
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इस्लामिक स्टेट का समर्थन अब तक तकरीबन दो सौ भारतीयों ने किया है जबकि फ्रांस, बेल्जियम जैसे कुछ देशों में इनकी संख्या इससे कई गुनी है जबकि उनकी मुस्लिम आबादी हम से बहुत कम। सरकार भेदभाव न बरते साथ ही सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों को हाशिये पर धकेलने, उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक बताये जाने की कवायद, सरकार ने सख्ती से नहीं रोका तो स्थितियां भविष्य में विद्रूप हो सकती हैं।
लेख संजय श्रीवास्तव द्वारा