

भारत में विपक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं।
विपक्ष को तथ्यों के आधार पर सरकार की आलोचना करने की सलाह दी गई है।
आरोपों के बजाय ठोस नीतियां और बेहतर विकल्प पेश करने पर जोर दिया गया।
जनादेश का सम्मान, पराजय का आत्ममंथन और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देने की अपील की गई।
Indian Opposition Role in Democracy: भारत को मजबूत विपक्ष चाहिए। ऐसा विपक्ष जो सरकार से कठिन सवाल पूछे, उसकी कमियां उजागर करे लेकिन तथ्यों के साथ। ऐसा विपक्ष जो संस्थाओं पर प्रश्न उठाए लेकिन प्रमाण के साथ। ऐसा विपक्ष जो सरकार का विरोध करे तो उसके सामने बेहतर नीति और स्पष्ट विकल्प भी रखे। यह भाजपा ने किया है उन राज्यों में जहां विपक्ष में है वहां भी यही भूमिका निभा रही है।
विपक्ष की असली लड़ाई किसी एक सरकार या किसी एक नेता के विरुद्ध नैरेटिव खड़ा करने की नहीं, अपनी विश्वसनीयता पुनः अर्जित करने होनी चाहिए, जनादेश का सम्मान, अपनी पराजय का आत्ममंथन, आरोपों के स्थान पर प्रमाण, नैरेटिव के स्थान पर नीति और विरोध के स्थान पर विकल्प यही किसी भी विपक्ष को जनता के बीच फिर से विश्वसनीय बना सकता है।
लोकतंत्र में जनता अंतिम निर्णायक है। विपक्ष को तय करना होगा कि वह केवल सरकार का विरोध करना चाहता है या वास्तव में देश के सामने एक विश्वसनीय विकल्प बनना चाहता है। भारत में विपक्ष आज गंभीर विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है। लगातार जिस प्रकार के विषय, विचार और मुद्दे विपक्ष उठा रहा है, वे न तो तर्कसंगत हैं और न तथ्यपरक।
आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं से लेकर आकांक्षी भारत की अपेक्षाओं और देश की नीतिगत चुनौतियों तक, विपक्ष प्रभावी - भूमिका में दिखाई नहीं देता। जनता के वास्तविक प्रश्नों पर ठोस विकल्प देने के बजाय वह नैरेटिव की ऐसी आभासी लड़ाई में उलझा है, जिसकी बुनियाद कई बार तथ्यों से अधिक मात्र राजनीतिक आरोपों पर दिखाई देती है। लोकतंत्र में सरकारों की समीक्षा बहुत होती है लेकिन विपक्ष की नहीं। देश ने विपक्ष को संवैधानिक भूमिका सौंप रखी है। विपक्ष अपनी इस जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता।
संकट तब और गहरा जाता है जब अपनी यह भूमिका निभाना तो दूर बल्कि विपक्ष का नेतृत्व हठधर्मी हो जाए एवं उस पर सामंती अहंकार सवार हो। देश को अराजकता पर धकेलने का प्रयास होता है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कांग्रेस स्वयं या विभिन्न दलों के समर्थन से केंद्र की सत्ता में रही। देश की आर्थिक नीतियों, बजट, प्रशासनिक व्यवस्था और विकास की दिशा तय करने में उसकी निर्णायक भूमिका रही।
बीच में गैर-कांग्रेसी सरकारें भी आई, लेकिन कई दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व रहा। इसलिए उसके लंबे शासन की उपलब्धियों के साथ उसकी विफलताओं और नीतिगत निर्णयों की जवाबदेही से भी उसे बचाया नहीं जा सकता। समय के साथ भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक अकर्मण्यता, नीतिगत असमंजस और नेतृत्व से जुड़े प्रश्न राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आए। जनता के बीच असंतोष बढ़ा और कांग्रेस का राजनीतिक आधार कमजोर होता गया। 2014 में इस असंतोष ने निर्णायक रूप लिया।
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और केंद्र में भाजपा नीत सरकार बनी। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक व्यवस्था के प्रति जनता के बदलते रुझान का स्पष्ट संकेत था। यहीं से विपक्ष के सामने आत्ममंथन का अवसर था। चुनावी पराजय के कारणों को समझना, संगठन और नेतृत्व की कमियों को स्वीकार करना तथा जनता के सामने नई नीतियों और नए विकल्प के साथ जाना किसी भी लोकतांत्रिक दल का स्वाभाविक रास्ता होना चाहिए।
चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन गंभीर आरोपों को प्रमाणित करना भी उतना ही आवश्यक है। निर्वाचन आयोग ने ईवीएम में कथित छेड़छाड़ को प्रदर्शित करने का अवसर राजनीतिक दलों को दिया।
इसके बावजूद आज तक ऐसा कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया जिसने यह सिद्ध किया हो कि देश के चुनावों में ईवीएम के माध्यम से व्यवस्थित रूप से जनादेश बदला गया। वीवीपैट और मतगणना की निर्धारित प्रक्रियाएं चुनावी सत्यापन का हिस्सा हैं।
लेख-रजनीश अग्रवाल के द्वारा