

Highway Bridge Construction Failures: कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक तरफ भारत दुनिया का विकसित देश बनने का संकल्प प्रदर्शित कर रहा है, तो दूसरी तरफ आए दिन देश में अनेकानेक निर्माण कार्यों के बिखरने, टूटने जैसे कई हादसे घट रहे हैं।
देश में पिछले दो वर्षों में बुनियादी संरचना की दो दर्जन बड़ी परियोजनाएं जिनमें राष्ट्रीय राजमार्ग, एक्सप्रेस वे, हवाई अड्डे, फ्लाईओवर, पुल, प्रतिमा और अनेक सार्वजानिक भवन शामिल हैं, उनके क्षतिग्रस्त होने, गिरने और धराशायी होने की घटनाएं घट चुकी हैं। बिहार में 1700 करोड़ की लागत से खगड़िया और भागलपुर के बीच बन रहा 3 किमी पुल तीन बार गिरा।
आईआईआईटी रुड़की ने जब इस परियोजना की जांच की तो पता चला कि निर्माण सामग्री की क्वालिटी बेहद घटिया थी। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जो भारत के हाईवे मेकर कहे जाते हैं, वह भी राजमार्गों के निर्माण में हो रही गिरावट और हादसे की घटना को लेकर कई बार निरुत्तर दिखे हैं। अभी दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे में कई खंडों पर सड़क निर्माण की कमजोरी की घटना प्रकाश में आयी।
सबसे पहले राजस्थान में दौसा और सवाई माधोपुर में गड्डा हो गया। फिर इस मार्ग में गुजरात के अंकलेश्वर में 8 फीट गड्डा बन गया। गुजरात के सांचोर संतालपुर राजमार्ग में बारिश से दरार और खुरदुरापन का वाकया सामने आया। इस मामले पर सड़क ठेकेदार पर 2।8 करोड़ का जुर्माना लगाया गया।
करीब 19 नई राजमार्ग परियोजनाओं के निर्माण में खामियों को देखते हुए सड़क परिवहन मंत्री गडकरी अब तक एनएचएआई के 11 अधिकारियों को बर्खास्त भी कर चुके हैं। देश में हो रही इन घटनाओं ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिये हैं। ये निर्माण चंद लोगों की लापरवाही और लालच की कीमत पर देश में कई हादसे पैदा कर देते हैं। मिसाल के तौर पर पूर्वोत्तर भारत की निर्माणाधीन पनबिजली परियोजना में निर्मित हो रहे टनल के गिरने से 9 श्रमिक हताहत और 15 श्रमिक गंभीर रूप से घायल हो गए।
केरल में निर्माणाधीन 26 राजमार्गों में से 8 परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हुईं। प्रदेश के मल्लपुरम में एन एच 66 में 250 किमी लम्बा एलेवेटेड कॉरिडोर गिर पड़ा। यह सरकारी अधिकारियों, राजनीतिज्ञों और ठेकेदारों के नापाक गठबंधन की तरफ इशारा करता है? जब तक ये नापाक गठबंधन धूल धूसरित नहीं होगा, तब तक सार्वजानिक निर्माण कार्यों का धराशायी होना बंद नहीं होगा और तब तक विकसित भारत केवल नारा बना रहेगा।
निर्माण डिजाइन का मानसून प्रूफ नहीं होना, परियोजना संचालन में तकनीकी खामी और निर्माण डेडलाइन पूरी करने में दिखाई गई जल्दबाजी का भी नतीजा है कि इन परियोजनाओं में हादसे घटित हो रहे हैं। बिलकुल दक्ष, ईमानदार तथा कुशल निर्माण कंपनियों को इन निर्माण कार्यों का ठेका देना ही इस समस्या का निदान है। बिहार में सार्वजनिक निर्माणों खासकर पुलों के ढहने की कुछ ज्यादा ही घटनाएं घटती रही हैं।
अभी कुछ ही दिन पहले 10 सितंबर को प्रदेश के वैशाली जिले के लालगंज के पास निर्माणाधीन फोर लेन पुल का एक बड़ा कंक्रीट स्लैब लोहे के गर्डर लॉन्चर के साथ गिर गया, जिस हादसे में 8 मजदूर बुरी तरह से घायल हो गए। यह पुल केंद्र सरकार की भारतमाता परियोजना का हिस्सा था। इससे पूर्व 4 मई को प्रदेश के भागलपुर में गंगा नदी पर निर्मित महत्वपूर्ण विक्रमशिला ब्रिज का एक विशाल स्लैब नदी में गिर गया।
एक सप्ताह पूर्व इस पुल के मुख्य इंजीनियर ने पुल को पूरी तरह सुरक्षित बताया था। इस घटना के उपरांत उत्तर बिहार, बंगाल और झारखंड से भागलपुर का संपर्क कई दिनों तक बाधित रहा। तीसरी घटना प्रदेश के गोपालगंज में पिछले मार्च में घटी, जब यहां की घोघरी नदी पर निर्मित एक छोटा पुल गिर गया। ये अलग बात है कि इस निर्माण कार्य में जुड़े तीन इंजीनियरों को निलंबित कर कॉन्ट्रैक्टर को ब्लैकलिस्ट में डाल दिया गया।
लेख- मनोहर मनोज के द्वारा