नवभारत संपादकीय: यदि अर्थव्यवस्था बढ़ी तो रोजगार क्यों नहीं? सरकारी दावों और जमीनी हकीकत का पूरा सच

India GDP Growth Rate: देश की जीडीपी ग्रोथ को लेकर पूर्व वित्त सचिव के दावों और सरकारी जवाब के बीच बड़ा विवाद छिड़ गया है। जानिए क्या है आर्थिक आंकड़ों का पूरा गणित और जमीनी हकीकत।
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भारत की GDPसोर्स: सोशल मीडिया
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Inflation and Unemployment in India: देश की जीडीपी ग्रोथ 7.8 प्रतिशत बताए जाने के दे सरकारी दावे को पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने चुनौती देते हुए कहा है कि यह वास्तव में 2.6 प्रतिशत है। उनकी दलील है कि यदि पिछले वर्ष की जून तिमाही की जीडीपी को करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये नहीं किया जाए तो मौजूदा कीमतों पर वित्त वर्ष की पहली तिमाही की वृद्धि सिर्फ 2.6 प्रतिशत ही रहेगी।

आंकड़ों का खेल या वास्तविक विकास?

इसके जवाब में सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग ने कहा कि यह तर्क इसलिए सही नहीं है, क्योंकि इसमें स्थिर कीमतों की बजाय मौजूदा कीमतों के आंकड़ों से तुलना की गई है। 86.05 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी जीडीपी सीरीज से संबंधित था जबकि नवीनतम अनुमान के लिए 2022-23 आधार वर्ष वाली नई जीडीपी सीरीज को आधार बनाया गया है।

अगर ग्रोथ 7.8% है, तो रोजगार कहां हैं?

नवीनतम जीडीपी अनुमान की तुलना पुरानी और बदली जा चुकी जीडीपी सीरीज से करना सेब और संतरे की तुलना करने जैसा होगा। सांख्यिकी सचिव की इस दलील के बावजूद पूछा जा सकता है कि यदि सरकार के अनुसार अर्थव्यवस्था की गति 7.8 प्रतिशत है तो उस हिसाब से रोजगार निर्मित क्यों नहीं हुए? सरकार को रोजगार शून्य वृद्धि या जॉबलेस ग्रोथ शब्द भी अस्वीकार्य है।

प्रधानमंत्री की वित्त सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने पिछले दिनों कहा था कि जॉबलेस ग्रोथ नाम की कोई चीज नहीं होती। लेकिन जब केंद्र में कांग्रेस की सत्ता थी तब बीजेपी के अनेक नेताओं ने इस तरह का शब्द प्रयोग किया था। अब वह इससे परहेज क्यों कर रहे हैं? जब अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो क्यों अपील की जा रही है कि लोग एक साल तक सोना न खरीदें और विदेश यात्रा न करें? यदि इकोनॉमी सचमुच बढ़ रही है तो जनता को दिखाई क्यों नहीं देती ? लोगों को जानने का हक है कि वास्तव में देश के आर्थिक विकास की गति कितनी है?

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उद्योगपति भारत की बजाय विदेश में क्यों निवेश कर रहे हैं?

यह प्रश्न भी उठता है कि जब सरकार प्रथम तिमाही की ग्रोथ इतनी अधिक होने का दावा कर रही है तो महंगाई व बेरोजगारी क्यों इतनी बढ़ रही है? युवा वर्ग इतना हताश क्यों है? नए रोजगार क्यों नहीं निर्मित हो रहे हैं? बाजार में मांग क्यों नहीं बढ़ रही है? उद्योगपति भारत की बजाय विदेश में क्यों निवेश कर रहे हैं? केवल अति संपन्न लोगों को छोड़ दिया जाए तो आम जनता आर्थिक तंगी झेल रही है। नए उद्योग खुलने की बजाय पुराने उद्योग बंद हो रहे हैं।

रोजगार के नाम पर सेवा प्रदान करने वाले गिग वर्कर बढ़े हैं क्योंकि नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। सर्विस सेक्टर में 10 प्रतिशत वृद्धि हुई, लेकिन कृषि क्षेत्र में सिर्फ 3.6 फीसदी वृद्धि हो पाई। अर्थव्यवस्था में तेजी के जो चिन्ह हैं वह जमीन पर दिखाई नहीं दे रहे। गत वर्ष भी सरकार ने पहले जीडीपी 7.8 प्रतिशत होने का दावा किया था लेकिन बाद में इसे घटाकर 6.9 प्रतिशत पर ले आई थी।

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