नवभारत विशेष: विदेशी डाटा सेंटर से उपनिवेशवाद की आहट, हमारे पेशेवर डिजिटल ढुलाई मजदूर न बन जाएं!
India Digital Growth: भारत में डाटा सेंटर क्षमता तेजी से बढ़ रही है और यह 2030 तक 20 अरब डॉलर से अधिक बाजार बन सकता है। हालांकि इसके पर्यावरण और संप्रभुता पर प्रभाव को लेकर चिंता भी जताई जा रही है।
- Written By: अंकिता पटेल
डाटा सेंटर, डिजिटल अर्थव्यवस्था,(सोर्स: सोशल मीडिया)
India Data Centers Expansion: डाटा सेंटर निश्चित रूप से आधुनिक डिजिटल युग के पावरहाउस हैं। लेकिन भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे हमारी संप्रभुता और पर्यावरण की कीमत पर खड़े न हों। दावा है कि महानगरीय क्षितिज पर उभरती हुई विशालकाय इमारतें, जिन्हें ‘डाटा सेंटर’ कहा जाता है, डिजिटल अर्थव्यवस्था की नई रीढ़ बनकर जल्द ही देश को एआई और डिजिटल अर्थव्यवस्था का वैश्विक केंद्र बना देंगे, अरबों का निवेश आएगा, करोड़ों का जीवन बेहतर होगा, लाखों नौकरियां पैदा होंगी और देखते-देखते भारत ‘डिजिटल सुपरपावर’ बन जाएगा।
सरकार की कोशिशों से वर्ष 2020 में भारत की डाटा सेंटर क्षमता, जो महज 375 मेगावाट थी, 2025 में बढ़कर 1,500 मेगावाट से अधिक होते हुए आज 2 हजार मेगावाट से ऊपर जा रही है तथा 2031 तक इसके 10.5 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय आकलन है कि 2030 तक भारत का डाटा सेंटर बाजार 20 अरब डॉलर से भी ऊपर पहुंच सकता है। केंद्र सरकार के बजट और डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसी नीतियों ने गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन, ओपनए आई, एनटीटी और अन्य वैश्विक कंपनियों के लिए भारत को आकर्षक गंतव्य बना दिया है।
सरकार ने इनको आकर्षित करने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस के साथ भारी प्रोत्साहन और अगले 21 वर्षों तक कर छूट देने का अत्यंत उदार वादा किया है। विदेशी डाटा सेंटर्स की बड़े पैमाने पर देश में स्थापना क्या वाकई तकनीकी आत्मनिर्भरता देगी या देश को वैश्विक डिजिटल पूंजी का ‘सस्ता इंफ्रास्ट्रक्चर कॉलोनी’ बना देगी? यह कदम भारत को एक संप्रभु डिजिटल महाशक्ति बनाएगा या हमें वैश्विक डाटा के ‘ढुलाई मजदूर’ और देश को ‘आंकड़ों के गोदाम’ बना देगा? गूगल, माइक्रोसॉफ्ट अमेजन जैसी कंपनियां भारी निवेश के साथ आ रही हैं तो
महज इसलिए क्योंकि वे भारत को ‘लो-कॉस्ट डिजिटल जोन’ के रूप में देख रही हैं, जहां जमीन, बिजली और श्रम सस्ता है।
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डेटा सेंटर विस्तार और संसाधन संकट की चिंता
पर्यावरणीय प्रतिरोध सीमित है। भारत में डाटा सेंटर बनाने की लागत तकरीबन 7 मिलियन डॉलर प्रति मेगावाट है, जो सिंगापुर के सवा 11 मिलियन या जापान के पौने 13 मिलियन डॉलर के मुकाबले बहुत कम है, ऐसे में वे भारत क्यों न आएं? विदेशी कंपनियां यहां सर्वर लगाएंगी, डाटा स्टोर करेंगी, क्लाउड सेवाएं बेचेंगी, लेकिन भारतीय कंपनियों को एआई चिप डिजाइन, हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, ऑपरेटिंग सिस्टम, जीपीयू क्लस्टरिंग या एआई मैन्युफैक्चरिंग या कोर चिप डिजाइनिंग अथवा उन्नत कूलिंग तकनीक नहीं सिखाएंगी। ऐसे में भारत के कुशल पेशेवर तकनीकी नवोन्मेषक बनने के बजाय केवल ‘डिजिटल ढुलाई मजदूर’ की भूमिका में सिमट जाएंगे।
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लाखों नौकरियों के सृजन का दावा भी निराधार है। डाटा सेंटर पूंजी प्रधान उद्योग है, श्रम-प्रधान नहीं। निर्माण के शुरुआती 2 वर्षों के बाद वहां केवल 20 से 50 कुशल कर्मचारी ही चाहिए। डाटा सेंटर बहुत ज्यादा बिजली खाते और भारी मात्रा में पानी पीते हैं। एक 100 मेगावाट का डाटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 75 लाख लीटर से अधिक पानी निगल जाता है। 100 शब्दों का साधारण ईमेल जनरेट करने में एआई चैटवॉट का कूलिंग सिस्टम 2 बोतल पानी खर्च कर सकता है।
यह पानी कूलिंग सिस्टम के दौरान भाप बनने के चलते जल प्रणाली में वापस नहीं आता। भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी है और पीने योग्य पानी केवल 4 फीसद, देश के 50 से अधिक डाटा सेंटर मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद जैसे उन क्षेत्रों में स्थापित हैं, जो पहले से ही पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं।
हमारे पेशेवर डिजिटल ढुलाई मजदूर न बन जाएं !
विदेशी डाटा सेंटर्स की बड़े पैमाने पर देश में स्थापना क्या वाकई तकनीकी आत्मनिर्भरता देगी या देश को वैश्विक डिजिटल पूंजी का ‘सस्ता इंफ्रास्ट्रक्चर कॉलोनी’ बना देगी? यह कदम भारत को एक संप्रभु डिजिटल महाशक्ति बनाएगा या हमें वैश्विक डाटा के ‘ढुलाई मजदूर’ और देश को ‘आंकड़ों के गोदाम’ बना देगा?
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा
