

चीन की गतिविधियों से अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर तनाव की चिंता बढ़ी।
भारत-चीन गश्ती दलों के बीच संघर्ष और सीमा पर तंबू लगाने का दावा।
चीन पर अरुणाचल के गांवों के नाम बदलने और भारतीय क्षेत्र पर दावे करने का आरोप।
सीमा की स्थिति पर सरकार से स्पष्ट जानकारी देने की मांग।
India China Border Tensions and Arunachal Pradesh: भारत का बड़ा भूभाग 1962 के हमले में हड़पने के बाद भी विस्तारवादी चीन की लोलुप दृष्टि अरुणाचल पर लगी हुई है। सेना के बड़े जिम्मेदार अधिकारी का वक्तव्य यही दर्शाता है। इसके डेढ़ वर्ष पूर्व ऐसा ही वक्तव्य लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिया था, जिसे गंभीरता से नहीं लिया गया। जुलाई के अंतिम सप्ताह में अरुणाचल प्रदेश के सुबनसिरी जिले के तकसिंग के पास भारत व चीनी गश्ती दल में संघर्ष हुआ था। इसके कुछ दिन बाद चीन ने अतिरिक्त कुमुक भेजी और सीमारेखा के पास तंबू लगा दिए।
चीन ने अरुणाचल के कुछ गांवों के नाम भी बदल दिए हैं। चीन ने 1950 में तिब्बत को हड़प लिया था। भारत के साथ पंचशील समझौता करने के बाद चीन ने दगाबाजी की और हमला कर 22,000 वर्गमील क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। हमारा पवित्र तीर्थ कैलाश मानसरोवर भी चीन के कब्जे में है। आईटीबीपी के महासंचालक शत्रुजीत सिंह कपूर ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश की सीमा रेखा पर चीन मस्त सांड के समान हरकत कर रहा है। क्या इसे बर्दाश्त किया जाएगा? भारतीय जवान चीन का मजबूती से सामना कर रहे हैं लेकिन सरकार इस संबंध में देश को कोई जानकारी नहीं दे रही है।
प्रधानमंत्री मोदी एक बार तो चीन के संबंध में मन की बात कहें। छोटी चिनगारी भी अचानक आग का रूप ले सकती है। इस सत्य को कोई नकार नहीं सकता। आज भारत 1962 के समान कमजोर नहीं है। हमारी सेना के तीनों अंग ताकतवर हैं फिर भी चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी को पारंपरिक पद्धति से रोका नहीं जा सकता। किसी भी युद्ध का स्वरूप पारंपरिक नहीं रह गया है। ईरान जैसे देश ने भी नई तकनीक का इस्तेमाल कर बलशाली अमेरिका को झटका दिया। 1962 में भारत को आजाद हुए सिर्फ 15 वर्ष हुए थे। तब हमारी सेना इतनी तैयार नहीं थी
और अंदेशा नहीं था कि उत्तरी सीमा से चीन हमला करेगा। गत 26 अगस्त को दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर व्यापक चर्चा हुई लेकिन उसका निष्कर्ष शून्य रहा। सीमा क्षेत्र में शांति व सुव्यवस्था बनाए रखने और द्विपक्षीय संबंध सामान्य रखते हुए विकास के लिए वातावरण बनाने की वचनबद्धता चीन ने व्यक्त की, लेकिन अरुणाचल से लगी सीमा पर वह जो कुछ कर रहा है, उससे उसके आक्रामक इरादे और दगाबाजी सबके सामने है। उसके किसी भी वादे पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
चीन की कपटपूर्ण नीति है कि भारत को चर्चा में उलझाकर रखो और अपने काले कारनामे जारी रहने दो। चीन के साथ भारत के व्यापार संबंध हैं। उसका काफी माल भारत के बाजारों में बिकता है। इतने पर भी उसका आक्रामक रवैया कायम है। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान चीन ने मिसाइल और ड्रोन देकर पाकिस्तान की मदद की थी। गत 12 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भेट हुई थी तथा सीमा प्रश्न पर व्यापक चर्चा हुई थी। चीन की लद्दाख में घुसपैठ के दौरान गलवान घाटी में भारत के जवानों से खूनी मुठभेड़ हुई थी, जिसमें कांटेदार तार बंधे डंडों का उपयोग किया गया था।
इस झड़प में लगभग 100 चीनी सैनिक मारे गए थे, लेकिन चीन ने इसे कबूल नहीं किया था। बाद में दोनों देशों के सैनिक कमांडरों की बैठक हुई थी। सीमा विवाद का कोई समाधान नहीं हो पाया है। चीन अंग्रेजों की तय की गई मैकमोहन लाइन को नहीं मानता और हमारे राज्य अरुणाचल प्रदेश की 90,000 किमी जमीन पर दावा करता है। 1963 में पाकिस्तान ने चीन से सीमा करार किया, जिसमें पाकिस्तान ने गिलगिट-बाल्टिस्तान की 5,000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के हवाले कर दी थी।
आज भारत 1962 के समान कमजोर नहीं है। हमारी सेना के तीनों अंग ताकतवर हैं फिर भी चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी को पारंपरिक पद्धति से रोका नहीं जा सकता। किसी भी युद्ध का स्वरूप पारंपरिक नहीं रह गया है।
ईरान जैसे देश ने भी नई तकनीक का इस्तेमाल कर बलशाली अमेरिका को झटका दिया। 1962 में भारत को आजाद हुए सिर्फ 15 वर्ष हुए थे। तब हमारी सेना इतनी तैयार नहीं थी और अंदेशा नहीं था कि उत्तरी सीमा से चीन हमला करेगा। गत 26 अगस्त को दोनों देशों के बीच सीमा विवाद पर व्यापक चर्चा हुई लेकिन उसका निष्कर्ष शून्य रहा।
लेख-धनराज गावंडे के द्वारा