नवभारत विशेष: केरल और तमिलनाडु में एआई मंत्री क्यों?, बिना तैयारी की कवायद तो नहीं!
Artificial Intelligence Governance: एआई आधारित शासन व्यवस्था से सरकारी सेवाएं तेज, पारदर्शी और डेटा-संचालित हो सकती हैं। विशेषज्ञ अब अलग एआई मंत्रालय की जरूरत और इसकी संभावनाओं पर जोर दे रहे हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
कृत्रिम बुद्धिमत्ता,(सोर्स: सोशल मीडिया)
AI Driven Governance Services: भविष्य की सरकारें अब फाइलों और कागजों से आगे बढ़कर ‘एल्गोरिद्य और डाटा-संचालित शासन की ओर बढ़ रही हैं, जहां मुख्य ध्येय जनता को न्यूनतम समय में अधिकतम और पारदर्शी सेवाएं प्रदान करना है। अब एआई आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन सकता है। एआई मंत्रालय का मूल उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता को केवल एक ‘सॉफ्टवेयर टूल’ या तकनीकी औजार के रूप में देखना नहीं, बल्कि इसे सरकारी तंत्र और जनता की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाना है। एआई मंत्रालय काम करेगा तो तमाम मंत्रालयों, विभागों में फाइलों का निस्तारण तेज होगा, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति, डाटा प्रिडिक्शन से बजटीय आवंटन सटीक होगा, शिकायत निवारण त्वरित और पारदर्शी होगा।
स्कूलों के प्रदर्शन और बुनियादी ढांचे की एआई-मैपिंग की जा सकेगी। एआई-बेस्ड स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नलिंग से शहरों में जाम की समस्या का हल होगा तो सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी। गंभीर बीमारियों की शुरुआती और सस्ती जांच सुलभ होगी। वर्तमान में एआई का नियमन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आता है लेकिन एआई केवल आईटी का ही तो मुद्दा नहीं है, यह स्वास्थ्य निदान, कृषि और रक्षा समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सीधे प्रभावित कर रहा है। एक समर्पित मंत्रालय होने से इन सभी क्षेत्रों के लिए एकीकृत नीतियां बन सकेंगी।
एआई मंत्रालय की जरूरत पर बहस, समन्वय बनाम नई व्यवस्था का सवाल
समन्वय बढ़ेगा और नीतिगत गतिशीलता में तेजी आएगी। क्या देश में एआई का इस्तेमाल उस स्तर तक पहुंच गया है कि उसकी व्यापकता को व्यवस्था देने के लिए एक भारी भरकम मंत्रालय तथा पूर्णकालिक मंत्री की आवश्यकता है? एआई मंत्री के कार्यों और दायित्वों का निर्धारण हो चुका है? क्या केरल और तमिलनाडु के अलावा अन्य राज्य भी इस चलन का अनुसरण करेंगे? ब्रिटेन, जापान और सिंगापुर जैसे देशों ने कनाडा की तरह प्रत्यक्ष रूप से ‘एआई मंत्री’ का पद नहीं बनाया, किसी को ऐसी जिम्मेदारी देने के बदले वहां उन्होंने अपने ‘डिजिटल और प्रौद्योगिकी मंत्रालयों के भीतर ही एआई के लिए विशेष टास्क फोर्स और उच्च्चस्तरीय सचिवालयों पदों का गठन किया है।
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क्या तमिलनाडु और केरल की सरकारें भी अपने विज्ञान, तकनीक अथवा प्रोद्यौगिकी इत्यादि मंत्रालय के अंतर्गत्त कोई नया प्रभाग खोलकर यह कार्य संपादन नहीं कर सकती थी? क्या निकट भविष्य में केंद्र और राज्यों में पूरी तरह से नया ‘एआई मंत्रालय खोलने के बजाय, शुरुआती चरण में एक ताकतवर ‘राष्ट्रीय एआई प्राधिकरण’ या केंद्रीय मंत्रालय के भीतर ही एक स्वतंत्र ‘एअई विभाग’ बनाना अधिक उचित नहीं होगा? यह विभाग मंत्रालयों के बीच समन्वय का कार्य करेगा, जिससे गवर्नेस में एआई का उपयोग बढ़ेगा और लोकतांत्रिक जवाबदेही भी बहुत प्रभावित नहीं होगी।
AI मंत्रालय पर बहस: नवाचार या नई लालफीताशाही?
सवाल यह भी है कि एक नया मंत्रालय बनाने से मौजूदा आईटी मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी मंत्रालय और नीति आयोग के बीच यदि प्रशासनिक टकराव पैदा होगा, तो उसे कैसे रोका जाएगा? कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तमाम तकनीक, तौर-तरीके, अनुप्रयोग बेहद कम समय में बदल जाते हैं जबकि सरकारी मंत्रालयों की निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी होती है।
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जब तक फैसला हो तब तक तकनीक ही बदल जाए, ऐसे में यह मंत्रालय लालफीताशाही का शिकार होने से कैसे बचेंगे? संयुक्त अरब अमीरात अक्टूबर 2017 में ही एक समर्पित ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मंत्रालय’ का गठन कर दुनिया का पहला एआई देश कहलाया, तब महज 27 वर्ष की उम्र वाले ओमर सुल्तान अल ओलमा को दुनिया का पहला एआई मंत्री बनने का मौका मिला। इस मंत्रालय का लक्ष्य 2031 तक यूएआई को एआई के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
बिना तैयारी की कवायद तो नहीं!
केरल की शुरुआत के बाद तमिलनाडु के मंत्रिमंडल में भी एआई मंत्री की नियुक्ति ने एक नए चलन को आगे बढ़ाया है। इन दोनों राज्यों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए जो समर्पित प्रशासनिक ढांचा तैयार हो रहा है, यह मंत्रालय उसे बनाने में सहयोग करेगा और उसके पूरा होने के बाद उसका पूरा कामकाज देखेगा।
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा
