Middle East Water Security Issue ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Middle East Water Security Issue: ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट बंद कर देने से दुनियाभर के अधिकतर देशों में तेल व गैस की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। महंगाई में भी इजाफा हुआ है, लेकिन इस युद्ध की वजह से मध्य पूर्व में तेल से भी बड़ा संकट पानी बन गया है।
इस युद्ध में पानी हथियार बन गया है। पानी का महत्व तेल से भी अधिक हो गया है। क्योंकि जहां तेल ने फारस की खाड़ी को समृद्ध किया, वहीं डिसेलिनेटिड पानी उसे जीवित रखता है और यही बात इजराइल व गाजा पर भी लागू होती है।
इजराइल ने ईरान के डिसेलिनेशन प्लांट व उससे जुड़े पावर स्टेशन पर बमबारी की तो जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इजराइल, कुवैत, बहरीन आदि के ऐसे ही इन्फ्रास्ट्रक्चरों पर ड्रोन व मिसाइल से हमले किए, जिससे मध्य पूर्व में वास्तव में सबसे कमजोर रणनीतिक बिंदु तेल की जगह पानी बन गया है।
यह सब कुछ ऐसे समय में हो रहा है, जब जगह-जगह विश्व जल दिवस (22 मार्च) मनाने की तैयारी चल रही है। सऊदी अरब में एक भी नदी नहीं है। दोनों पक्षों की तरफ से न सिर्फ डिसेलिनेशन प्लांट्स को निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि कुछ मामलों में उन्हें चलाने वाले पावर स्टेशनों को भी नष्ट किया गया है, जिससे लाखों लोगों के लिए पानी के बुनियादी स्रोत पर खतरा मंडराने लगा है।
पहले अमेरिका व इजराइल ने ईरान के केशम द्वीप पर बने डिसेलिनेशन प्लांट पर बमबारी की, जिससे लगभग 30 गांवों को होने वाली जल आपूर्ति बाधित हुई। इसके जवाब में ईरान की मिसाइल ड्रोन ने जेबेल अली पोर्ट (यूएई), फुजैरह एफ। पावर/वॉटर कॉम्प्लेक्स (यूएई), दोहा वेस्ट प्लांट (कुवैत), बहरीन व इजराइल के डिसेलिनेशन प्लांट्स पर भी हमले किए हैं।
खाड़ी में लगभग 400 और इजराइल में पांच डिसेलिनेशन प्लांट्स हैं और अगर इन्हें ‘वैध निशानों के रूप में देखा जाने लगा तो कुछ ही दिनों में इस क्षेत्र में पीने के पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो जाएगा।
पृथ्वी पर जो सबसे रईस देश हैं, वह पूर्णतः डिसेलिनेशन प्लांट्स पर पीने के पानी के लिए निर्भर हैं, जो समुद्र के खारे पानी को पीने के पानी में तब्दील करते हैं। दुबई, कुवैत सिटी व मनामा जैसे शहरों का अस्तित्व तो केवल इसलिए है कि उनके तटों पर जो डिसेलिनेशन प्लांट्स स्थापित हैं, वह समुद्र से खारे पानी को पंप करते हैं और फिर उसे पीने योग्य बनाकर लाखों लोगों को सप्लाई करते हैं, इनके बिना नल कुछ ही दिनों में सूख जाएंगे।
तेल बाजारों के शोर में जल के त्वरित संकट को अनदेखा कर दिया गया था। कुवैत व बहरीन जैसे देश तो पीने के पानी के लिए क्रमशः 90 प्रतिशत व 95 प्रतिशत डिसेलिनेशन प्लांट्स पर ही निर्भर हैं, जबकि ओमान की निर्भरता 86 प्रतिशत व सऊदी अरब की 70 प्रतिशत है। गाजा में अधिकतर जल इन्फ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो चुका है, जिससे वहां पानी की भयंकर कमी महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अगर हमलों को रोका न गया तो 100 मिलियन से अधिक लोग पीने के पानी को तरसने लगेंगे, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन की आशंका बढ़ जाएगी।
युद्ध से पहले ही ईरान लगातार पिछले 6 साल से सूखे का सामना कर रहा है कि उसके रिजर्वायरों में क्षमता का 10-12 प्रतिशत पानी ही रह गया है। पानी की कमी मध्य पूर्व में कृषि को भी प्रभावित कर रही है।
इराक में इस समय सूखे की स्थिति ऐसी है, जो पिछले 100 वर्षों के दौरान देखी नहीं गई, जल संकट कृषि उत्पादन को भी प्रभावित करता है, जिससे फूड सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है और ग्लोबल फूड दामों में वृद्धि हो जाती है।
यह 20वीं शताब्दी का करिश्मा ही है कि खारे पानी को पीने योग्य बना दिया गया है, रिवर्स ओसमोसिस से, लेकिन यह एक प्रकार की जबरदस्त कमजोरी भी है।
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जैसा कि इस युद्ध में देखा जा रहा है कि डिसेलिनेशन प्लांट्स व उन्हें चलाने वाले पावर स्टेशनों पर बारूद बरसाया जा रहा है ताकि लोग गोली बम से अगर बच भी जाएं तो प्यासे ही मर जाएं।
लेख- शाहिद ए चौधरी के द्वारा