

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का विरोध अब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवालों तक पहुंच गया है।
एसआईआर, मतदाता सूची से नाम हटाने और एकतरफा फैसलों को लेकर विवाद बढ़ा है।
चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों की रिपोर्ट ने आयोग के भीतर मतभेदों को उजागर किया।
इंडिया गठबंधन की रैली और प्रतीकात्मक महाभियोग इसी विरोध का हिस्सा हैं।
Opposition Protest Against Chief Election Commissioner: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की लामबंदी अब केवल कांग्रेस या राहुल गांधी के राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रह गई है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), मतदाताओं के नाम हटाए जाने, चुनाव आयोग के कामकाज में एकतरफा फैसलों और आयोग के भीतर असहमति के आरोपों ने इस विवाद को संस्थागत विश्वसनीयता का प्रश्न बना दिया है।
सितंबर में सामने आई रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से 10 महीनों में कम से कम 14 बार दर्ज कराई गई आपत्तियों का उल्लेख इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण मोड़ था। इससे विपक्ष को यह कहने का अवसर मिला कि मामला केवल राजनीतिक विरोध का नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर भी निर्णय प्रक्रिया को लेकर मतभेदों का है। इसके बाद विपक्ष का निशाना सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त पर केंद्रित हो गया। दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया गठबंधन की रैली और इससे पहले 19 विपक्षी दलों की ओर से किया गया प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग इसी रणनीति के हिस्से थे।
विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन्हें पद से हटाने की मांग को राजनीतिक अभियान में बदलने की कोशिश की। सरकार की मुश्किल यह है कि वह ज्ञानेश कुमार का बचाव जितनी आक्रामकता से करती है, उतना ही आम नागरिक के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर उनके बचाव की इतनी जरूरत क्यों महसूस की जा रही है? जब कोई सरकार किसी व्यक्ति के पक्ष में असाधारण रूप से खड़ी दिखाई देती है, तो उसके पीछे के कारणों को लेकर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
राहुल गांधी का तर्क है कि लोकतंत्र में मतदाता का वोट ही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है और यदि मतदाता सूची की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाए तो पूरी चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। जनता के बीच यह धारणा है कि चुनाव आयोग पर सत्ता का प्रभाव है और विपक्ष के सवालों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। उसका राजनीतिक लाभ कांग्रेस और विपक्ष को मिल सकता है।
भाजपा के लिए समस्या यह है कि ज्ञानेश कुमार को बचाने और उनसे दूरी बनाने, दोनों के अपने राजनीतिक जोखिम हैं। यदि सरकार उनके बचाव में पूरी ताकत लगाती है, तो विपक्ष को यह कहने का अवसर मिलता है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता से ज्यादा महत्वपूर्ण सरकार के लिए अपने पसंदीदा अधिकारी को बचाना है। दूसरी ओर, यदि सरकार किसी तरह ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए राजी कर लेती है, तो राहुल गांधी इसे अपनी राजनीतिक लड़ाई की जीत के रूप में पेश करेंगे। इससे राहुल को सरकार को पीछे हटाने वाले विपक्षी नेता की छवि गढ़ने का अवसर मिलेगा। महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सामान्य सरकारी पदाधिकारी नहीं हैं, जिन्हें सरकार अपनी इच्छा से हटा सके।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने जैसी है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश आवश्यक है।
सरकार के सामने उन्हें सीधे बर्खास्त करने का विकल्प नहीं है। स्वैच्छिक इस्तीफा एक अलग परिस्थिति होगी, लेकिन यदि ऐसा होता है, तो उसके पीछे राजनीतिक दबाव की कहानी भी खड़ी हो सकती है। केंद्र सरकार के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता यह होगा कि वह ज्ञानेश कुमार के बचाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय चुनाव आयोग की विश्वसनीयता बहाल करने पर ध्यान दे।
सरकार को यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति के पद पर बने रहने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस संस्था पर जनता का भरोसा है जिसका वह नेतृत्व कर रही है। कहने का मतलब यह कि इस समय ज्ञानेश कुमार ने सरकार और भाजपा के सामने ऐसा धर्मसंकट खड़ा कर दिया है, जिसमें दोनों रास्ते राजनीतिक कीमत मांगते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक रास्ते की कीमत तत्काल चुकानी पड़ेगी और दूसरे की कीमत धीरे-धीरे लोकतांत्रिक भरोसे के क्षरण के रूप में सामने आ सकती है।
लेख- नरेंद्र शर्मा के द्वारा