नवभारत विशेष: मॉल संस्कृति पर ऑनलाइन बाजार भारी, देश के बड़े-बड़े मॉल अब बन रहे घोस्ट मॉल

India Ghost Malls: ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते चलन ने मॉल संस्कृति को बड़ा झटका दिया है। कई शहरों के बड़े मॉल ग्राहकों की कमी से ‘घोस्ट मॉल’ में बदल रहे हैं, जहां अब सन्नाटा पसरा है।
India Malls Online Shopping Impact
मॉल संस्कृति पर ऑनलाइन बाजार भारीफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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India Malls Online Shopping Impact: लगभग 3 दशक पहले जब मॉल संस्कृति ने भारत में प्रवेश किया, तो सबसे पहले शिकार हुए सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर, इस पर इनके मालिकों ने पायरेसी से होते घाटे के कारण सिनेमा हॉल को बेचकर मॉल डेवलप करना आरंभ कर दिया।

उसके बाद पूरा देश एक से एक शानदार मॉल्स में रंगने लगा। अब ऑनलाइन संस्कृति ने बाजार को घर तक ला दिया है, मॉल संस्कृति से आम जनता का मन उचट गया है। धूम-धड़ाके से बने बड़े-बड़े मॉल, अब ग्राहकों की राह देखते हुए धूल-मिट्टी से अटने लगे हैं।

जहां पहले रंगबिरंगी रोशनी, स्वचलित सीढ़ियां, महंगे ब्रांड की दुकानें और बच्चों के लिए झूलों की दुनिया आबाद थीं, अब वहां पर सन्नाटा है। मार्केट की भाषा में यह घोस्ट मॉल बन गए हैं। कुछ बड़े मॉल्स को छोड़ दिया जाए, तो अब हर शहर में लोग इनमें जा ही नहीं रहे। अगर जा भी रहे हैं, तो वहां पर बने हुए सिनेमा हॉलों में। इन सिनेमा हॉलों की हालत भी खराब होने लगी है। डिजिटल होती दुनिया में आज सबसे अधिक तेजी से विकास हो रहा है, ऑनलाइन शॉपिंग का।

आप आलू से लेकर सोना-चांदी तक मंगा सकते हैं। कोई उपभोक्ता वस्तु ऐसी नहीं है, जो ऑनलाइन प्लेटफार्म पर नहीं मिलती। सबसे खास बात यह कि यहां पर आपको बाजार से 20 प्रतिशत तक वस्तुएं सस्ती मिल जाती हैं। यह आपके घर पर 10 मिनट में भी आ जाती हैं।

ऑनलाइन शॉपिंग से मॉल्स की रौनक घटी, ग्राहक हुए दूर

अनुमानतः देश में कम से कम 500 से 550 मॉल्स में से आधे में से बड़े ब्रांड ने अपनी दुकानें उठा ली हैं, जो दुकानें बची हैं वहां पर दिनभर में ग्राहकों के लिए मालिक तरस रहे हैं। बिजली का बिल तथा दूसरे खर्चे भी मुश्किल से निकल रहे हैं। जेन जी को ऑनलाइन ने जो सुविधा दी है, वह अपने आप में नायाब है। वह अपने हिसाब से जरूरत का सामान देखता है, उसे दस स्थानों पर ट्रेस करता है, फिर मंगाता है। इसके बाद वह उसे पहनकर देख लेता है, मन होता है तो उसमें फोटो खींच लेता है या किसी कार्यक्रम में पहनकर आता है और नियमानुसार उसे वापस कर देता है, उसका खर्चा जीरो।

मतलब यहां न विंडो शॉपिंग और न ही दुकानदार से कोई झिकझिक, जब इतनी सुविधा है, तो वह मॉल्स में क्यों जाएगा? सेल के झूठे विज्ञापनों ने भी बड़ा नुकसान किया है। हर जगह यह लिखना कि दुकान जल्दी बंद करने जा रहे हैं, इसलिए इतना सस्ता सामान है, ने भी मॉल्स की दुकानों पर से कस्टमर का भरोसा तोड़ा।

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मॉल कल्चर संकट में, 22% मॉल बंद होने की कगार पर

32 बड़े शहरों में करीब 22 प्रतिशत मॉल या तो बंद हो गए हैं या फिर वह बंदी के कगार पर हैं। इसमें कम से कम 70 अरब रूपये की हानि हुई। देश के करीब 71 प्रतिशत मॉल अब पहले जैसी हालत में नहीं हैं और यहां पर ग्राहकों के नहीं आने से व्यापारी भी गायब हो रहे हैं। सिर्फ 25 साल में ही मॉल कल्वर फेल हो गया। जिन मॉल ने सिंगल सिनेमा को बंद कराया था, वह सिनेमा कम से कम आधी सदी तो देख ही चुके थे।

अब जो मॉल बचे हैं या फिर जिनमें यूथ जा रहा है, वह एक नई दुनिया है। इनमें सिनेमा घर तो हैं ही साथ ही होटल भी हैं और बाजार भी। यहां आने के बाद आपको वीकेंड गुजारने के लिए और कहीं नहीं जाना पड़ता। यहां पर इवेंट आयोजन की व्यवस्था है, तो कोई वर्कशाप भी कर सकते हैं। यहां पर वह सुविधा भी है कि आप सामान खरीद लें और वह आपके घर पहुंच जाए। कुछ मॉल्स ऐसे हैं, जहां पर आपको देर रात तक रहने की आजादी मिलती है।

सब कुछ घर बैठे मंगाया जा रहा

आज दुनिया का लगभग हर बड़ा ब्रांड ऑनलाइन उपलब्ध है। जिस तरह से सिंगल सिनेमा बंद करके अधिक कमाई के साधन तलाशे गए थे, ठीक उसी तरह से मॉल्स की जगह आईटी कंपनियां अपने कार्यालय खोल रही हैं, वेयर हाउस वाले इन्हें किराए पर ले रहे हैं, कोचिंग संस्थानों की ब्रांच खुल रही हैं, हेल्थ केयर यूनिट भी खुल रही हैं।

लेख- मनोज वाष्र्णेय के द्वारा

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