Populist Schemes Fiscal Impact ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Populist Schemes Fiscal Impact: देश के तमाम राज्यों में चुनाव जीतने के उद्देश्य से लोक-लुभावन मुफ्तखोरी की योजनाओं को बढ़ावा दिया जाता है, जिसका बजट पर असर पडता है और विकास के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं हो पाता। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफाम्र्स (एडीआर) के सर्वेक्षण के अनुसार 42 प्रतिशत नागरिकों ने नकद रकम या भेटवस्तु हासिल की।
महाराष्ट्र में हजारों फर्जी लाभार्थियों ने ‘लाडकी बहीण’ योजना का लाभउठाया। ऐसी योजना एक बार शुरू की तो बंद नहीं की जा सकती। इस समय देश के विभिन्न राज्यों पर 100 लाख करोड़ रूपये से अधिक का कर्ज लदा है।
इनमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक व उत्तर प्रदेश राज्य अग्रणी हैं। केंद्र शासन पर भी 200 लाख करोड़ कर्ज का भार है। इसमें रेवड़ी योजनाओं का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा है।
कर्ज लेकर ऐसी योजनाएं चलाई जा रही हैं। बहुमत हासिल करने के लिए ऐसौ खैराती योजनाएं लागू की जाती हैं। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव निकट रहते वहां की डीएमके सरकार ने मुफ्त बिजली देने की घोषणा की है।
इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फटकार सुनाई है, लेकिन राज्य सरकार पर शायद ही इसका प्रभाव पड़ेगा। कुछ दिनों पूर्व त्तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने ‘लाडकी बहीण’ योजना का तमिल संस्करण लागू किया, जिसमें महिलाओं को 3 महीने की अग्रिम रकम तथा 2,000 रुपये का बोनस दिया। ऐसी योजनाओं से चुनाव में विजय सुनिश्चित की जाती है।
समाज कल्याण के नाम पर ऐसी योजनाओं की शुरुआत तमिलनाडु में ही हुई थी। स्कूलों में मिड-डे मील लागू करने से बच्चों की उपस्थिति बढ़ी। बाद में यह योजना देश भर में अपनाई गई। 70 के दशक में 1 रुपये में साढ़े 4 किलो चावल तमिलनाडु में दिया गया।
वहां एमजी रामचंद्रन, करुणानिधि, जयललिता ने साड़ियां, टीवी, साइकिलें, वॉशिंग मशीन, लैपटॉप आदि दिए, फिर नगद रकम भी दी जाने लगी। कर्नाटक में मुफ्त लाभ देने वाली 5 योजनाएं हैं। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ में बहनों के नाम पर खाते में रकम जमा की जाती है।
बिहार चुनाव के मौके पर नीतीश कुमार ने हर महिला के खाते में 10,000 रुपये जमा करवाए और अपनी पार्टी जदयू की विजय सुनिश्चित की। राज्य की डेढ़ करोड़ महिलाओं को यह लाभ मिला। दिल्ली, पंजाब, राजस्थान में मुफ्त बिजली दी जाती है।
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केंद्र सरकार भी 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देती है। इस तरह की योजनाओं से लोक निकम्मे ही जाते हैं और दीर्घकालीन विकास की उपेक्षा होती है। विकास कार्यों के लिए सरकार के पास पैसे नहीं रहते।
रिजर्व बैंक भी कह चुका है कि ऐसी योजनाओं से राज्य कर्ज की खाई में चला जाता है और सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ बढ़ता चला जाता है। नौकरी या रोजगार देने में असमर्थ सरकार ऐसी खैरात से जनता को तसल्ली देती है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा