Navabharat Nishanebaaz: आज चल रही है स्पेस एज, लेकिन राजनीति में परसेंटेज
High Percentage Culture: आज शिक्षा में परसेंटेज की दौड़ बढ़ गई है। 100% कटऑफ तक की मांग छात्रों पर दबाव बढ़ा रही है, जिससे असली ज्ञान और योग्यता पर सवाल उठने लगे हैं।
- Written By: अंकिता पटेल
नवभारत डिजाइन फोटो
100 Percent Cutoff Admission: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, इस स्पेस एज में परसेंटेज की बहुत चिंता की जाती है। जिस विद्यार्थी का 10वीं और 12वीं में अच्छा परसेंटेज है, का नामी शिक्षण संस्था या कॉलेज में प्रवेश पा सकता है। एक जमाना वह भी था जब 60 प्रतिशत अंक लेकर प्रथम श्रेणी में पास होना और किसी विषय में 75 प्रतिशत अंक लेकर डिस्टिंक्शन पाना गौरवपूर्ण माना जाता था। अब तो 90 परसेंट से कम वालों की कोई कद्र ही नहीं है। छात्र पर दबाव रहता है कि ज्यादा से ज्यादा मार्क्स हासिल करें। कुछ तो शत-प्रतिशत तक नंबर ले आते हैं। क्या इसका मतलब यह हुआ कि उनकी अक्ल पाठ्यपुस्तक के लेखक के बराबर होती है? दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ कॉलेजों में तो एडमिशन का कट-ऑफ 100 प्रतिशत नंबर पर होता है। आखिर इतना परसेंट हासिल करने का क्या राज है?’
हमने कहा, ‘आपको मालूम होना चाहिए कि दुनिया का सारा व्यवहार परसेंटेज पर चलता है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप इम्पोर्ट पर 25 से 50 परसेंट तक टैरिफ लगाते हैं। इस तरह की लूट से वह अमेरिका को पुनः शक्तिशाली या ग्रेट बनाना चाहते हैं।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, उतनी दूर की बात छोड़िए, अपने देश के नेता और अधिकारी भी परसेंटेज निकालने में प्रवीण हैं। विकास का रथ परसेंटेज के पहियों पर चलता है। मंत्री, सांसद, विधायकों और अफसरों को जो ठेकेदार ज्यादा परसेंटेज देता है, उसका टेंडर पास हो जाता है। सारा खेल दलाली और कमीशन का है। कितने ही अधिकारी अपने वेतन से ज्यादा तो कमीशन में कमा लेते हैं। अपने ही शहर में परसेंटेज के लालच में एक सड़क साल में 4 बार खोदी और फिर बनाई जाती है। कुछ योजनाएं सिर्फ कागज पर रहती हैं लेकिन उनकी निर्माण लागत के परसेंटेज की पहले ही बंदरबांट हो जाती है।’
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हमने कहा, ‘जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब उन्हें परसेंटेज का रहस्य मालूम था। उन्होंने कहा था कि हम केंद्र से गरीब के लिए 1 रुपया भेजते हैं लेकिन उसे सिर्फ 15 पैसे मिल पाते हैं। मतलब यह कि 85 प्रतिशत रकम बीच के लोग खा जाते हैं। मोदी युग में रकम सीधे खाते में डाली जाती है फिर भी भ्रष्टाचारी लोग अपनी कमाई का रास्ता निकाल ही लेते हैं। नेताओं की राजनीति भी अगड़े-पिछड़े, जाति, भाषा के परसेंटेज पर निर्भर रहती है।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
