नवभारत संपादकीय: सहकारी बैंकों पर नेताओं का कब्जा, जोखिम में जमाकर्ताओं और किसानों का पैसा

District Cooperative Bank Crisis: देश के 50 जिला सहकारी बैंक घाटे में हैं। राजनीतिक दखल, पक्षपातपूर्ण कर्ज वितरण और कमजोर वसूली से किसानों व जमाकर्ताओं का भरोसा प्रभावित हो रहा है।
Political Interference in Cooperative Banks
सहकारिता क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेपफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Highlights

  • आरबीआई की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 351 जिला सहकारी बैंकों में से 50 घाटे में थे।

  • राजनीतिक हस्तक्षेप, पक्षपातपूर्ण कर्ज वितरण और कमजोर वसूली को बैंकों की बदहाली की वजह बताया गया है।

  • जिला सहकारी बैंकों पर राजनीतिक घरानों के वर्चस्व से किसानों और जमाकर्ताओं का पैसा जोखिम में पड़ता है।

  • लेख में पारदर्शी ऑडिट, कर्ज का सार्वजनिक ब्योरा और योग्य संचालकों के चुनाव जैसे सुधार सुझाए गए हैं।

Political Interference in Cooperative Banks: रिजर्व बैंक की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार देश के 351 जिला सहकारी बैंकों में से 50 घाटे में थे। इन घाटे वाले बैंकों में से लगभग 82 प्रतिशत बैंक महाराष्ट्र सहित 5 राज्यों में हैं। इन बैंकों की दुर्दशा का कारण नियमोल्लंघन करते हुए राजनीतिक हस्तक्षेप से दिया गया कर्ज, कर्ज वितरण में पक्षपात, सत्ताधारी बैंक संचालकों की संस्थाओं को झुकता माप, वसूली में शिथिलता है।

अनेक बैंकों में जमाकर्ताओं की रकम और किसानों के भविष्य का जोखिम राजनेताओं के निर्णयों पर अवलंबित रहता है। यदि बैंक घाटे में चला गया, तो उसका नुकसान जमाकर्ताओं और किसानों को उठाना पड़ता है। बैंकों के संचालक राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखते हैं। यद्यपि जिला बैंकों के चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होते हैं, लेकिन उसमें भी निर्विरोध निर्वाचन के नाम पर विरोधियों को किनारे लगा दिया जाता है।

सहकारी बैंकों में पारदर्शिता जरूरी

सहकारिता का यह उद्देश्य नहीं है कि आर्थिक संस्थाओं पर राजनीतिक एकाधिकार हासिल किया जाए, सहकारिता राजनीतिक घरानों की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि वह सदस्यों, किसानों और जमाकर्ताओं का सामूहिक आर्थिक उपक्रम है। इन बैंकों की जिम्मेदारी किसानों को फसल कर्ज, पूरक उद्योगों के लिए वित्तपूर्ति सहकारी शक्कर कारखाने, पतपेढ़ी को आर्थिक मदद करना आदि है। इसलिए संचालक मंडल का चुनाव करते समय उम्मीदवार की आर्थिक मामलों की समझ, सहकार क्षेत्र का अनुभव तथा संस्था के हित के लिए काम करने की क्षमता देखी जानी चाहिए। इसके लिए कुछ बुनियादी सुधार आवश्यक हैं जैसे कि जिला सहकारी बैंक का नियमित वित्तीय लेखा परीक्षण प्रकाशित किया जाना चाहिए।

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जिला सहकारी बैंकों पर किसानों से ज्यादा नेताओं का दबदबा?

संचालकों से संबंधित संस्थाओं को दिए गए कर्ज का विवरण सदस्यों की जानकारी के लिए सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जिला बैंकों पर कब्जा करने के लिए नेताओं में खींचतान देखी जाती है। इसे देखते हुए प्रश्न उठता है कि यह बैंक किसानों के हित के लिए हैं या राजनेताओं के स्वार्थ के लिए? जिला बैंकों के चुनाव में कौन जीता, इससे अधिक महत्व इस बात का है कि बैंक के माध्यम से कितने किसानों को समय पर कर्ज दिया गया, कितनी सहकारी संस्थाएं सक्षम हुई और कितने जमाकर्ताओं का विश्वास कायम रहा।

वास्तव में यह देखा जाता है कि जिला सहकारी बैंकों के जरिए नेता जिले की राजनीति की लगाम अपने हाथ में रखते हैं। जिसके हाथ में जिला बैंक हो उसका राजनीति में दबदबा बना रहता है। जिला बैंकों के संचालक मंडल के चुनाव में सहकारिता के विकास के लिए प्रतिस्पर्धा कम, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई अधिक नजर आती है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा