यह मतदाताओं को रिश्वत नहीं तो और क्या है! राजनीतिक पार्टियां चुनाव के दौरान मुफ्त में बिजली, रसोई गैस, स्कूटी, हर महिला को रकम देने जैसे वादों की झड़ी लगा देती हैं. ऐसे खैरात बांटने वाले वादों को पूरा करने में सरकारी खजाना खाली होने लगता है और लोग निकम्मे हो जाते हैं. इससे यही मानसिकता पनपती है- ‘अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम, दास मलूका कह गए, सबके दाता राम! लोगों की श्रमशक्ति और कर्मठता को नुकसान पहुंचता है और निठल्लेपन की आदत पड़ जाती है.
यूपी में 2.3 करोड़ किसानों को मुफ्त बिजली, कॉलेज छात्राओं को मुफ्त स्कूटी, 2 मुफ्त गैस सिलेंडर का वादा किया गया है. पंजाब में 55 लाख परिवारों को 300 यूनिट मुफ्त बिजली तथा हर महिला को 1000 रुपए प्रति माह भत्ता देने का ‘आप’ ने वादा किया है. प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठक में वरिष्ठ केंद्रीय नौकरशाहों ने चिंता जताई कि राजनीतिक दलों की ऐसी लोकलुभावन योजनाएं भारत को लंका के रास्ते पर ले जा सकती हैं जो कि इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है.
इन ब्यूरोक्रेट का कहना है कि इस तरह की योजनाएं आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं होतीं, इन पर रोक लगाई जानी चाहिए. उन्होंने पंजाब, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश व बंगाल पर उंगली उठाई और कहा कि ऐसे कई राज्यों की आर्थिक सेहत काफी खस्ता है. लोकलुभावन योजनाओं पर रोक नहीं लगाई गई तो कई राज्य आर्थिक रूप से बेहाल हो जाएंगे. छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की घोषणा की है.
कई राज्य मुफ्त बिजली दे रहे हैं. बीजेपी ने यूपी और गोवा में मुफ्त रसोई गैस देने के साथ कई लुभावनी चुनावी घोषणाओं को पूरा करने का वादा किया है. कुछ राज्यों ने बजट सीमा के बाहर जाकर कर्ज लिया है. कैग ने तेलंगाना और केरल को इसे अपने बजट में शामिल करने को कहा है. पंजाब की जितनी जीडीपी है, उसका 53.3 प्रतिशत हिस्सा कर्ज है.