नवभारत विशेष: दिल्ली में लुटियन जोन का बदलता चेहरा, राष्ट्रपति भवन में स्थापित हुई राजगोपालाचारी की प्रतिमा
Central Vista Project: मोदी सरकार सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के जरिए दिल्ली का नक्शा बदल रही है। प्रतिमा हटाने से लेकर नए प्रशासनिक भवनों तक, औपनिवेशिक विरासत मिटाकर नई सांस्कृतिक पहचान गढ़ी जा रही है।
- Written By: आकाश मसने
राष्ट्रपति भवन में आज़ाद भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की मूर्ति का अनावरण करतीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (डिजाइन फोटो)
Modi Government Delhi Plan: आने वाले दिनों में सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की नई परियोजना में दिल्ली स्थित शास्त्री भवन, कृषि भवन, उद्योग भवन, निर्माण भवन और परिवहन भवन को भी या तो स्थानांतरित किया जाएगा या रूपांतरित किया जाएगा। कहने का मतलब यह कि अब सेंट्रल विस्टा लुटियन जोन का स्थान लेगा। इससे पूर्व मोदी सरकार ने नए संसद भवन का भी निर्माण कराया, जिसमें संसद की पिछले दो साल से बैठक चल रही है और पुराने संसद भवन का नया नामकरण संविधान भवन किया गया है।
जाहिर है कि मोदी सरकार नई दिल्ली की वास्तु संरचना करने वाले लुटियन की छाप मिटाना चाह रही है। मोदी सरकार द्वारा जो तीन पहचानें मिटाई जा रही हैं, उनमें पहली है मुस्लिम शासन से जुड़ी पहचानें। हालांकि उनकी कलाकृतियों और स्थापत्य कला को हटाना तो संभव नहीं पर मुस्लिम नाम वाले शहरों और रेलवे स्टेशनों के नए नामकरण किए गए हैं। जिस दूसरी पहचान को बदलने पर काम हो रहा है, उसमें अंग्रेजों के काल के भवन और कानूनों के बदले जाने की कोशिश है। मोदी सरकार की तीसरी रणनीति कांग्रेस शासन के खासकर नेहरू गांधी परिवार से जुड़ी पहचानों, योजनाओं, संस्थाओं के नए नामकरण कर भाजपा संघ की विचारधारा और महापुरुषों को स्थापित करना है।
नया निर्माण पहले से बेहतर होना चाहिए
बड़ा सवाल यह है कि इतिहास को जब हम अपनी नई राष्ट्रीय मंशा के आधार पर मिटाते हैं और फिर उस पर नया निर्माण कर नया इतिहास निर्मित करते हैं, तो वह पहले से अव्वल और बेहतर होनी चाहिए। मिसाल के तौर पर हमने नया संसद भवन बनाया जो नए दौर की संसदीय आवश्यकता के मुताबिक जरूरी था, पर नए निर्माण के मुकाबले अभी भी पुराना संसद भवन ज्यादा मजबूत लगता है। अभी भारत सरकार ने अपना नया प्रशासनिक भवन कर्तव्य भवन 1, 2, 3 बनाया है, पर इन भवनों के सामने अभी अंग्रेजों द्वारा बनाए नॉर्थ और साउथ ब्लॉक ज्यादा रॉक सॉलिड लगते हैं। सवाल यहां केवल बेहतर निर्माण को लेकर नहीं है बल्कि व्यय राशि के समुचित इस्तेमाल का भी है, निर्माण के तकनीकी पहलू का भी है और दूसरा श्रेय लेने की जल्दबाजी में आनन-फानन में निर्माण कार्य को पूरा कराए जाने का भी है।
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नए संसद भवन का उद्घाटन 2023 में ही हुआ, पर इसकी पूरी फिनिशिंग एक साल बाद जाकर हो पाई। मोदी सरकार ने ये कार्य जरूर अच्छा किया कि अंग्रेजों के काल की बनी सभी आइकोनिक बिल्डिंगों राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक को डिमोलिश नहीं किया और उन्हें एक बड़े म्यूजियम के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है। यह ठीक है कि हम इतिहास बदलें और उसे अपनी राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का बेहतर स्वरुप प्रदान करें, पर जो नई कृति बने वह पहले से यदि बेहतर न तो कमतर भी न हो। हमें इस बात को नहीं भूलना होगा कि देश में पूर्व मध्य काल में निर्मित मंदिरों और स्तंभों, मुस्लिम काल में बनी मीनारों और मकबरों तथा अंग्रेजों के काल में बने मुंबई वीटी स्टेशन, कोलकाता विक्टोरिया भवन और दिल्ली के लुटियन जोन, निर्माणों के विकल्प नहीं बना सकते।
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राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित
ब्रिटिश शासनकाल में समूची नई दिल्ली का निर्माण करने वाले वास्तुशिल्पी एडवर्ड लुटियंस की राष्ट्रपति भवन में लगी प्रतिमा को हटाया गया और वहां आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी की प्रतिमा स्थापित की गई। जिसका अनावरण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। इस अवसर पर प्रधानमंत्री का संदेश पढ़ा गया कि औपनिवेशिक काल की इस पहचान को हटा देना देश के लिए गौरव की बात है। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने नवनिर्मित प्रधानमंत्री कार्यालय ‘सेवा तीर्थ’ का स्वयं उद्घाटन किया, जिसने करीब 75 साल से चल रहे साउथ ब्लॉक स्थित पीएमओ का स्थान लिया है। इसी के साथ लुटियन द्वारा निर्मित नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक स्थित भारत सरकार के मंत्रालयों को नवनिर्मित कर्तव्य भवन 1-2-3 में स्थानांतरित किया जा रहा है।
लेख- मनोहर मनोज के द्वारा
