महाराष्ट्र पर बढ़ता जा रहा कर्ज का बोझ, आर्थिक अनुशासन की आवश्यकता
महाराष्ट्र सरकार पर इस समय 7,80,000 करोड़ रुपए कर्ज का भार है। इसके पहले 2014 में यह कर्ज का बोझ 2,94,000 करोड़ रुपए था। कितने ही नेताओं को लगता है कि विकास के लिए ज्यादा से ज्यादा कर्ज लेना चाहिए।
- Written By: किर्तेश ढोबले
(डिजाइन फोटो)
एक समय आर्थिक मोर्चे पर देश का नेतृत्व करनेवाला महाराष्ट्र पिछले एक दशक में आर्थिक अनुशासन के मामले में पिछड़ गया है। राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश आ रहा है, टैक्स संकलन भी बढ़ रहा है फिर भी महाराष्ट्र पर कर्ज का बोझ बढ़ता चला जा रहा है। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने महावितरण के लिए लगभग 30,000 करोड़ रुपए के कर्ज की गारंटी ली है। इसका अर्थ यह है कि यदि महावितरण कर्ज अदा नहीं कर पाया तो उसे चुकाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। कुछ समय पूर्व राज्य सरकार ने ऐसी ही गारंटी शक्कर कारखानों को दी थी। 13 चीनी मिलों के कर्ज के लिए 1,900 करोड़ रुपए की गारंटी दी गई है।
महाराष्ट्र सरकार पर इस समय 7,80,000 करोड़ रुपए कर्ज का भार है। इसके पहले 2014 में यह कर्ज का बोझ 2,94,000 करोड़ रुपए था। कितने ही नेताओं को लगता है कि विकास के लिए ज्यादा से ज्यादा कर्ज लेना चाहिए। इसमें 2 दिक्कतें हैं। एक तो यह कि कर्ज के बढ़ते ब्याज को चुकाते रहने से विकास के लिए कम रकम उपलब्ध रह जाती है। दूसरी दिक्कत यह है कि राज्य सरकार जितनी ज्यादा कर्ज की गारंटी देती है उतनी ही उसकी नया कर्ज लेने की क्षमता घट जाती है। इसलिए कर्ज की सीमा निश्चित करना आवश्यक है। इस वजह से 2006 में आर्थिक जिम्मेदारी और बजट व्यवस्थापन कानून बनाया गया और तय किया गया कि राज्य सरकार 80,000 करोड़ रुपए कर्ज तक गारंटी लेगी।
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अब तक सरकार ने 70,000 करोड़ रुपए तक की सीमा पार कर ली है। वह डेढ़ लाख करोड़ रुपए कर्ज की गारंटर है। इसमें महावितरण और सड़क विकास महामंडल का कर्ज शामिल है। राज्य सरकार व कुछ नेता दलील दे सकते हैं कि विकास करना है तो कर्ज की गारंटी देनी होगी। राज्य में 3 विद्युत कंपनियों के निर्माण का उद्देश्य यह था कि वे स्वतंत्र, स्वावलंबी व सक्षम बनें। यही उद्देश्य सड़क विकास महामंडल को लेकर था।
यदि फिर भी इसके कर्ज की गारंटी लेनी पड़ती है तो मूल उद्देश्य का क्या हुआ? किसी भी राज्य के बजट का मुख्य उद्देश्य केवल बैलेंस शीट पेश करना नहीं होता बल्कि राज्य के समस्त संसाधनों का उपयोग गरीबों, वंचितों के विकास तथा समाज के उत्थान के लिए करना होता है। यदि आर्थिक अनुशासन नहीं रह गया तो बात बिगड़ जाती है। यदि विभिन्न उपक्रमों के कर्ज की गारंटी सरकार ने ले ली तो शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मदों के लिए पैसा कम पड़ जाएगा। इस समय भी ओल्ड पेंशन, लाड़की बहीण जैसी योजनाओं से सरकारी खजाने पर भार आ रहा है। आगे चलकर महाराष्ट्र में कोई भी सरकार आए, उसके सामने राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और आर्थिक अनुशासन लागू करने की चुनौती होगी।
लेख चंद्रमोहन द्विवेदी द्वारा
