गलत है मन में घुटते रहना, अच्छा है कभी-कभी रोना (सौ. डिजाइन फोटो)
नवभारत डिजिटल डेस्क: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, मुंबई के उपनगर के प्लेटफार्म पर एक व्यक्ति बेंच पर अकेला बैठा रो रहा था। किसी ने उसका वीडियो बनाकर ऑनलाइन शेयर कर दिया लेकिन किसी ने उसके दुख की वजह नहीं पूछी।’ हमने कहा, इंसान को हिम्मत के साथ मुश्किलों का सामना करना चाहिए। रोना कमजोरी की निशानी है।
लड़कों को बचपन में ही डांटकर कह दिया जाता है कि तुम लड़के हो, क्या लड़कियों की तरह रोते हो? अमिताभ बच्चन ने भी एक फिल्म में कहा था- मर्द को दर्द नहीं होता। चुलबुले और रोमांटिक किरदार निभानेवाले किशोर कुमार या देव आनंद को क्या किसी फिल्म में आपने रोते देखा था? हमारे नेता भी चुनाव हारने के बाद नहीं रोते। उन्हें मालूम है कि जीत-हार तो लगी ही रहती है।’
पड़ोसी ने कहा, ‘निशानेबाज, मर्द हो या औरत, रोना सभी को आता है। कोई खुलकर रोता है तो कोई छुपकर। आपने गुलाम अली की गजल सुनी होगी- चुपके-चुपके रात-दिन आंसू बहाना याद है, हम को तो आशिकी का वो जमाना याद है! पुरानी हिंदी फिल्मों में ट्रेजेडी किंग दिलीपकुमार और ट्रेजेडी क्वीन मीनाकुमारी को आप रोता हुआ देख सकते हैं। पुरानी फिल्म मेला, जोगन, बाबुल, देवदास में दिलीपकुमार ने हताश प्रेमी के रूप में खूब आंसू बहाए थे। मशहूर गायक मोहम्मद रफी पर बेतुकी टिप्पणी करते हुए अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने कहा था- मोहम्मद रफी गाते कहां थे! वो तो रोते थे। उन्हें यह नहीं पता कि रफी ने दर्द भरे गीतों के अलावा शम्मी कपूर और जॉनी वाकर के लिए मस्ती भरे गीत भी गाए थे।’
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हमने कहा, ‘रोना बुरी बात नहीं है। मन में घुटते रहने की बजाय खुलकर रो लेना अच्छा है। आंसुओं में दिल का गुबार बह जाता है। खुशी और गम दोनों जीवन का हिस्सा हैं। जो संवेदनशील व्यक्ति है वह दूसरों के लिए भी रो लेता है। जब कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद राज्यसभा से रिटायर हुए थे तब प्रधानमंत्री मोदी की आंखों में आंसू आ गए थे। आपने गीत सुना होगा- जो हमने दास्तां अपनी सुनाई आप क्यों रोए!’