संपादकीय: पाकिस्तानी फौज को बलूचों की चुनौती

Balochistan Conflict Crisis: बलूचिस्तान की आग फिर भड़की है। दशकों से दबे अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों की लूट और सैन्य अत्याचारों ने बलूचों को बगावत की राह पर ला खड़ा किया है।
Editorial: The Pakistani army faces a challenge from the Baloch people.
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
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Pakistan Balochistan Human Rights: पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान में बगावत के 11 शोले धधक रहे हैं। पाकिस्तानी सेना और बलूचों के ताजा संघर्ष में सैकड़ों लोग मारे गए, इस्लामाबाद में बैठे शासकों ने पिछले 7 दशकों से भी ज्यादा समय से बलुचिस्तान की जनता पर भीषण अत्याचार करते हुए उसे बुनियादी हक से वंचित रखा है।

1947 के पहले तक बलूचिस्तान एक स्वतंत्र सियासत था जिसका नाम 'कलात' था। वहां का अमीर (शासक) भारत के साथ विलय चाहता था, लेकिन अंग्रेजों व जिन्ना ने ऐसा होने नहीं दिया। बलूचों को उनकी इच्छा के खिलाफ पाकिस्तान में जबरन शामिल कराया गया और उनसे सौतेला व्यवहार किया जाता रहा।

बलूचिस्तान में प्राकृतिक गैस का भंडार, सोना, तांबा, कोयला, दुर्लभ खनिज, अरब सागर का तट रहने पर भी इसे पिछड़ा रखा गया और वहां के लोगों से गुलामों की तरह व्यवहार किया जाता है। पाकिस्तान की राजनीति व सेना में पंजाबी मुस्लिमों का वर्चस्व है जो बलूचों का दमन करते हैं। जब भी बलुचिस्तान में न्याय व अधिकारों की मांग हुई वहां सेना ने भारी जुल्म ढाए।

बलुचिस्तान के ग्वाडर बंदरगाह को विकास के नाम पर पाकिस्तान ने चीन के हवाले कर दिया है। चीन वहां ऊर्जा प्रकल्प बनाने के साथ सड़कें भी बना रहा है जिसे बलूच विदेशी हस्तक्षेप मानते हैं। पाकिस्तान की सरकार बलूचों पर जघन्य अत्याचार कर रही है।

सेना ने क्लीन अप ऑपरेशन चला रखा है। जवाब में बलूच लिबरेशन आर्मी तथा अन्य संगठनों ने भी अपनी अस्मिता, संस्कृति की रक्षा व आजादी के लिए पाकिस्तानी फौज के खिलाफ संघर्ष छेड़ रखा है। बलूचों की लड़ाई सिर्फ पाकिस्तान से नहीं है।

यह चीन के लिए भी चुनौती है जो वहां अपने पैर पसार रहा है। पाकिस्तान बेतुका आरोप लगा रहा है कि बलूच विद्रोहियों को भारत की मदद मिली हुई है। जब पाकिस्तान विश्वमंचों पर कश्मीर का राग अलापता है तो भारत को भी बलुचिस्तान की वास्तविकता उजागर करनी चाहिए जहां मानवाधिकारों को कुचलते हुए अमानुषिक अत्याचार किए जा रहे हैं।

वहां 2 बलूच महिलाओं ने आत्मघाती हमले किए। इससे पता चलता है कि कितना भीषण असंतोष छाया हुआ है। बलूचों ने एक बार ट्रेन यात्रियों को बंधक बनाकर अपनी ताकत दिखा दी थी।

रेल मार्ग, सैनिक अड्डे, फौजी काफिले, बिजलीघर व चीन द्वारा बनाए जा रहे प्रकल्प उनके निशाने पर हैं। पाकिस्तान सरकार अत्याचार रोक कर बलूचों से चर्चा करे तो शांति का मार्ग निकल सकता है अन्यथा इसी तरह खून-खराबा होता रहेगा।

लेख-चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा