नवभारत विशेष: AI और एल्गोरिद्म ने पकड़ ली है वोटर की नब्ज? क्या एग्जिट पोल को पूरी तरह भरोसेमंद मानें
Assembly Elections 2026: एग्जिट पोल के नतीजों ने बंगाल से केरल तक सियासी हलचल बढ़ा दी है। क्या एआई और बिग डाटा के दौर में मतदाता का मन मशीन के लिए पूरी तरह प्रेडिक्टेबल हो गया है?
- Written By: अंकिता पटेल
बंगाल एग्जिट पोल,(प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया)
Assembly Elections 2026 Exit Poll: बंगाल में 6 में से 5 एग्जिट पोल भाजपा के पक्ष में जा रहे हैं और अगर पोल ऑफ पोल्स की बात करें तो भाजपा को यहां 154 और टीएमसी को 132 सीटें मिल रही हैं। यानी बंगाल में पहली बार भाजपा बहुमत पाने जा रही है। पिछली बार के एग्जिट पोल इससे भी ज्यादा आक्रामक थे और नतीजा उससे भी ज्यादा स्पष्ट। तमिलनाडु में द्रमुक और असम में भाजपा को एग्जिट पोल सत्ता में वापसी करते हुए दिखा रहे हैं, जबकि केरल में कांग्रेस और पुड्डुचेरी में एनडीए गठबंधन सत्ता में लौट रहा है, ऐसी एग्जिट पोल की भविष्यवाणी है।
इन एग्जिट पोल के आते ही बहस तेज हो गई है कि क्या इस एआई के दौर में मतदाता का व्यवहार डाटा और एल्गोरिद्म के आईने में बिल्कुल सटीकता के साथ पढ़ा जा सकता है? इस सवाल पर लोगों का मत बंटा हुआ है, इसलिए अब 4 मई पर ही नजरें टिकी हैं, क्योंकि असली नतीजे ही तय करेंगे कि मतदाता का मन वास्तव में कितना प्रेडिक्टेबल हुआ है।
क्या होता है एग्जिट पोल?
एग्जिट पोल मूलतः मतदाताओं से पूछे गए सवालों पर आधारित होते हैं। हालांकि यह पहले जितना अब सरल-सपाट भी नहीं रहा, बल्कि कहीं अधिक उन्नत हो चुका है। विशेषकर बड़े सैंपल साइज, डिजिटल डाटा कलेक्शन, रियल टाइम एनालिटिक्स, सपोर्टिव एल्गोरिद्म और मशीन लर्निंग मॉडल के साझे विश्लेषण और एफर्ट के कारण। कई एजेंसियां 50 हजार से लेकर 2 लाख तक के सैंपल का दावा करती हैं। लेकिन क्या वाकई मतदाता इनमें ईमानदारी से अपना मन खोलकर रख देता है?
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AI और एल्गोरिद्म के आईने में मतदाता
एआई कहता है, वोटर अब एल्गोरिद्म से संचालित है, पर क्या यह वास्तव में सही है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस डिजिटल युग में चुनावी व्यवहार पर तकनीक का जबर्दस्त प्रभाव देखने को मिल रहा है। हम यह न भूलें कि आज की तारीख में बिग डाटा के चलते मतदाता प्रोफाइलिंग बहुत बारीक हो गई है। आज हर पार्टी मतदाताओं के मन के साथ उसके सूक्ष्म व्यवहार पर नजर रखती है और उसी के मुताबिक उनको दबोचने की कोशिश करती है। आदमी और मशीन में एक फर्क है और यह फर्क बना रहना चाहिए कि आदमी सौ फीसदी प्रेडिक्टेबल नहीं हो सकता।
एग्जिट पोल के समर्थक कहते हैं जब इतना डाटा उपलब्ध है, तो मतदाता का व्यवहार भी एक पैटर्न फॉलो करता है यानी वह प्रेडिक्टेबल हो चुका है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सिर्फ एक डाटा प्वॉइंट नहीं, वह एक हाड़-मांस का इंसान भी है, जिसकी सोच पर कई अदृश्य कारक असर डालते हैं।
स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि, जातीय और सामाजिक समीकरण, किसी के साथ भावनात्मक जुड़ाव या दुराव और अचानक आखिरी पलों में बिना किसी वजह से बदल गया मन भी। ये सारे ऐसे कारक हैं, जिनको एल्गोरिद्म के दायरे में समेट लेना आसान नहीं।
करोड़ों मतदाताओं के मन का 50 हजार छोड़िए दो लाख लोग भी पूरी तरह से प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। क्योंकि हर इंसान अपने आप में एक विशिष्ट मौजूदगी रखता है। अपनी गुप्त सोच रखता है। सच्चाई यही है कि इंसान अभी इतना भी अनुमानित नहीं हुआ कि उसकी अपनी स्वतंत्र और मौलिक मौजूदगी का कोई मतलब ही न रह जाए।
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अगर अंतिम नतीजे बिल्कुल वैसे ही आते हैं, जैसे डाटा और एल्गोरिद्म का आकलन बताता है, तो किसी हद तक चिंतित होने की जरूरत है कि क्या मशीन के सामने इंसान अब मौलिक नहीं रहा? सच्चाई 4 मई 2026 को सामने आएगी। तब पता चलेगा कि क्या हम वाकई ऐसे दौर में आ गए हैं, जब डिजिटल क्रांति, इंसानी निर्णय को पूरी तरह से डाटा और एल्गोरिद्म के प्रभाव में ले चुकी है या फिर इंसानी व्यवहार की जटिलता बनी रहेगी। वास्तविक नतीजे सिर्फ यह नहीं बताएंगे कि कौन जीता, कौन हारा? वो ये भी बताएंगे कि इस आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के दौर में मानव कितना ‘मानव’ बचा हुआ है।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा
