

Ashok Singhal Life and Legacy: एक बहुत सुंदर सुभाषित है, "वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर। परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर।" इसका मतलब है कि पेड़ कभी अपने फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल अपने पास नहीं रखती। इसी तरह, संत स्वभाव के लोग भी स्वयं को प्राथमिकता ना देते हुए, सदैव दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं, अपना जीवन लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं। अशोक सिंघल का जीवन इस भावना का उदाहरण है। हम अशोक सिंघल का जन्म शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं।
यह एक महान विभूति के सम्मान का सुअवसर है। उन्होंने आध्यात्मिक साधना, सांस्कृतिक जागरण और दशकों तक समर्पित भाव से समाज एवं संगठन के कार्यों को आगे बढ़ाया। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मुझे अशोक जी के साथ लंबे समय तक कार्य करने, उनसे सीखने, उनसे संवाद करने और उनका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला। मुझे 1981 का एक प्रसंग याद आता है। उस समय मैं एक युवा कार्यकर्ता के तौर पर संगठन की ओर से मिली जिम्मेदारियां निभा रहा था।
तब मुझे अशोक जी का हाथ से लिखा एक पत्र मिला। उन्होंने मुझे कुछ जिम्मेदारियां सौंपी थीं। उस समय अशोक सिंघल ससे पत्र पाना, मेरे लिए बहुत विशेष और यादगार क्षण बन गया था। मैंने उन्हें कई दशकों तक दिन-रात काम करते देखा। वे देश के दूर-दराज के क्षेत्रों की लंबी और कई बार कठिन यात्राएं किया करते थे।
गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में जाना उन्हें विशेष रूप से प्रिय था। वे लगातार इस पर चिंतन करते थे कि समाज के वंचित और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों के लिएऔर क्या किया जा सकता है। जब भी देश में कहीं प्राकृतिक आपदा आती, तो अशोक सिंघल सबसे पहले वहां पहुंचने वालों में होते या फिर प्रभावित लोगों की सहायता के लिए कार्यकर्ताओं को मार्गदर्शन देते। वर्ष 2001 में कच्छ में आए भूकंप के बाद उनके साथ का मेरा अनुभव अविस्मरणीय बन गया।
अशोक जी अत्यंत प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार से थे। उनके पिता महावीर जी की एक प्रशासक के रूप में पहचान थी। उनके एक भाई श्री बी.पी.सिंघल जी पुलिस अधिकारी बने और बाद में संसद सदस्य भी रहे। दूसरे भाई वी।पी। सिंघल त्रिपुरा के तब मुख्य सचिव बने, जब यह नया राज्य बना था। बहुत कम उम्र में ही उनके व्यवहार में दूसरों के प्रति करुणा और सेवा की अद्भुत भावना दिखने लगी थी।
वे चाहते थे कि भारत का पुनरुत्थान हो और मां भारती की संतान गौरवशाली उपलब्धियां हासिल करें, प्रयागराज में पले-बढ़े अशोक जी कई घंटे संगम के तट पर बैठा करते थे। नदी के प्रति उनका स्वाभाविक आकर्षण था। वहां आने वाले साधु-संत और श्रद्धालुओं से भी उनकी बहुत आत्मीयता थी। इससे भारत के सांस्कृतिक लोकाचार की उनकी समझऔर समृद्ध हुईए दूसरों के लिए जीने की यही ललक उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में ले आई। उनको जो भी जिम्मेदारी मिली, उसे उन्होंने पूरे उत्साह, अनुशसन और कर्तव्यभाव से निभाया।
अपनी ओजस्वी वाणी और अभिव्यक्ति की अद्भुत शैली से वे पूरी सभा को मंत्रमुग्ध कर देते थे। जो भी उनके संपर्क में आता, वह उनकी सादगी से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। संत समाज के साथ उनके संबंध बहुत प्रगाढ़ थे। देशभर के साधु-संतों के बीच भी उनका काफी सम्मान था।
संतगण उनके परामर्श को महत्व देते थे और उनकी बातों को पूरे आदरभाव से सुनते थे। मेरी स्मृति में ऐसी दो घटनाएं उभर रही हैं, जिनसे श्री अशोक सिंघल जी के विराट व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। पहली घटना 1993 की है। विश्व हिंदू परिषद ने स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अमेरिका में एक सम्मेलन आयोजित किया था।
विदेश में भव्य सम्मेलन का विजन, उसकी प्लानिंग और विभिन्न समूहों को एक मंच पर लाने का भगीरथ प्रयास श्री अशोक जी के अद्वितीय संगठनात्मक कौशल का परिचायक था।
दूसरी घटना वर्ष 2000 की है, जब त्रिनिदाद और टोबैगो के पोर्ट ऑफ स्पेन में विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन हुआ था। उस समय में भी वहीं था। मैंने प्रत्यक्ष देखा कि अशोक सिंघल की उपस्थिति ने अन्यप्रतिनिधियों में कितना उत्साह भर दिया था।
लेख- प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी के द्वारा