

BJP Allies UCC Stand: गृहमंत्री अमित शाह द्वारा यह विश्वास व्यक्त करने के बाद कि एनडीए शासित सभी 21 राज्य 2029 तक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू कर देंगे, बीजेपी के तीन सहयोगी दलों ने सावधान रहने की सलाह दी है, जो वास्तव में दबे शब्दों में प्रस्ताव का विरोध है।
तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी), जो आंध्र प्रदेश में सत्ता में है, ने कहा है कि इस विषय पर अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई है और जब जरूरत पड़ेगी, तब वह इस प्रस्ताव पर विचार करेगी व सभी स्टेकहोल्डर्स से भी विचार-विमर्श करेगी। जनता दल (यूनाइटेड), जो बिहार में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा है, ने कहा है कि वह इस सिलसिले में अमित शाह से बातचीत करेगी।
बीजेपी के एक अन्य सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने कहा है कि वह समता व विविधता के प्रति समर्पित है और संविधान सभी समुदायों की अलग-अलग परम्पराओं व प्रथाओं का सम्मान करता है। लोजपा (राम विलास) के प्रमुख चिराग पासवान, जो केंद्र में मंत्री भी हैं, ने कहा है कि यूसीसी का प्रस्ताव सार्वजनिक किया जाना चाहिए, विभिन्न स्टेकहोल्डर्स के हितों का संज्ञान लिया जाये, विस्तृत विचार-विमर्श किया जाये और उसके बाद ही उनकी पार्टी अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करेगी।
दो महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं। एक, अमित शाह ने इस समय ही यूसीसी लागू करने की घोषणा क्यों की है? दूसरा यह कि टीडीपी, जद (यू) व लोजपा (राम विलास) को बीजेपी के सहयोगी दल होने के बावजूद यूसीसी पर आपत्ति क्यों है? बीजेपी के जो तीन प्रमुख वैचारिक उद्देश्य रहे हैं, उनमें अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, धारा 370 हटाना, तथा यूसीसी का लागू करना रहा है। बीजेपी शासित उत्तराखंड में इसे लागू भी कर दिया गया है, जबकि गुजरात, असम व मध्य प्रदेश ने इस संदर्भ में कानून पारित कर दिया है।
राजस्थान, महाराष्ट्र, बंगाल व छत्तीसगढ़ ने कानून बनाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी है, जबकि राजस्थान ने ड्राफ्ट विधेयक को मंजूरी दे दी है। महाराष्ट्र को छोड़कर इन सभी राज्यों में बीजेपी की अपने अकेले दम पर सरकारें हैं। महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार है, लेकिन शिव सेना (शिंदे) व एनसीपी (अजित पवार) इस स्थिति में नहीं हैं कि देवेंद्र फड़णवीस के समक्ष अपना पक्ष रख सकें।
बहरहाल, यह हालात टीडीपी की नहीं हैं। स्वतंत्र राय रखना टीडीपी व जद (यू) की मजबूरी है। वह नहीं चाहतीं कि बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगल ले। एक समय था जब बीजेपी पंजाब में अकाली दल की, महाराष्ट्र में शिव सेना की, बिहार में जद (यू) की, ओडिशा में बीजू जनता दल की, असम में असम गण परिषद की जूनियर पार्टनर हुआ करती थी। आज यह सब क्षेत्रीय पार्टियां कहां हैं; सब हाशिये पर पहुंच गई हैं। मायावती की बसपा ने भी अनेक बार बीजेपी से गठबंधन किया और आज यह उत्तर प्रदेश में भी कहीं नहीं हैं, जबकि 2007 में उसने लखनऊ में अपने दम पर सरकार बनाई थी।
बिहार में जद (यू) भी सीनियर से जूनियर पार्टनर हो गई है। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियां अपने मत आधार को सुरक्षित नहीं रख सकीं, जिसमें बीजेपी सेंध मारने में कामयाब रही। टीडीपी बहुत मुश्किल से आंध्रप्रदेश में सत्ता में लौटी है। वह अपना जनाधार खोना नहीं चाहती, इसलिए फूंक-फूंककर कदम रख रही है। यूसीसी धर्म-विशिष्ट व्यक्तिगत कानूनों की जगह विवाह, तलाक, विरासत व लिव-इन संबंधों के मामले में सभी नागरिकों के लिए समान नियम लाने का प्रयास है। वर्तमान में एक संघीय संसदीय क़ानून लाने की बजाय यूसीसी को आहिस्ता-आहिस्ता एक-एक राज्य में लाया जा रहा है।
यूसीसी हमेशा से ही बीजेपी के वैचारिक उद्देश्य का हिस्सा रहा है। उसकी राज्य सरकारें इस पर कानून भी बना रही हैं। लेकिन अमित शाह द्वारा इस पर अचानक प्रेस कांफ्रेंस करना और वह भी एनडीए के सहयोगी दलों को विश्वास में लिए बिना, राजनीति से प्रेरित लगता है। इस समय छात्र आंदोलनों की वजह से पूरे देश में शिक्षा सुधार, रोजगार व महंगाई आदि बहुत बड़ा मुद्दा बन गए हैं। इसलिए अनुमान यह है कि अमित शाह सियासी नैरेटिव बदलने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने यूसीसी को मुद्दा बनाया है।
लेख-शाहिद ए चौधरी के द्वारा