Navabharat Nishanebaaz: शाह का नहीं दिखना कैसी है पहेली, किसके आदेश पर चली थी गोली
Rahul Gandhi Shah: अमित शाह की संसद में मौजूदगी को लेकर राहुल गांधी के सवाल और किरेन रिजिजू के जवाब पर ‘निशानेबाज’ ने अपने अंदाज में सियासी तंज कसा है।
- Written By: अंकिता पटेल
निशानेबाज (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
Amit Shah Parliament Presence: पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘निशानेबाज, कांग्रेस नेता राहुल गांधी का सवाल है कि गृहमंत्री अमित शाह संसद में क्यों नहीं आते? उन्हें जवाब देते हुए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू कहते हैं कि शाह रोज संसद में आते हैं और यहां देर रात तक मौजूद रहते हैं। आखिर यह कैसी पहेली है?’
हमने कहा, ‘यह अपनी-अपनी दृष्टि है। बीजेपी नेताओं और भक्तों को मोदी और अमित शाह का दिव्य दर्शन सदैव होता रहता है, क्योंकि वह उनके हृदय में बसे हैं। एक शेर है जब जरा गर्दन झुकाई, देख ली तस्वीरे यार ! दूसरी ओर विपक्ष कह रहा है छुपने वाले सामने आ, छुप-छुपके मेरा जी ना जला, सूरज से किरन, बादल से पवन कब तलक छुपेगी ये तो बता! विपक्ष मांग कर रहा है जरा सामने तो आओ छलिए, छुप-छुप छलने में क्या काम है।
विपक्ष के लिए अमित शाह इनविजिबल मैन या अदृश्य इंसान हो गए हैं। किरेन रिजिजू मानते हैं कि विपक्ष में दृष्टिदोष है। संसद में अमित शाह मौजूद हैं, लेकिन विपक्ष उन्हें देख नहीं पा रहा है। नया संसद भवन अति विशाल है। कोई उसके किसी कक्ष या टॉयलेट में छुपा हो तो उसे कैसे देखा जा सकता है?’
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पड़ोसी ने कहा ‘निशानेबाज, विपक्ष को शाह को देखने की इतनी व्यग्रता है तो सीसीटीवी पर देखकर पता लगाए कि वह संसद में किधर से आते हैं और चुपचाप कहां छुप जाते हैं। परिस्थिति ऐसी है कि छुप गया कोई रे दूर से पुकार के, दर्द अनोखे हाय, दे गया प्यार के! छुपना भी एक कला है। वी। शांताराम की फिल्म का गीत था- तू छुपी है कहां, मैं तड़पता यहां! एक धार्मिक फिल्म का गीत था- मुझी में छिप गए मुझी से दूर, ये कैसा दस्तूर !’
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हमने कहा, ‘आयुष्मान खुराना और कीर्ति सेनन की फिल्म का नाम था लुकाछिपी। अब संसद में लुकाछिपी जारी है। राहुल अमित शाह से पूछना चाहते हैं कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी युवाओं पर पैलट गन किसके आदेश पर चलाई गई? यदि शाह कबूल करते हैं कि गन उनके आदेश पर चलाई गई, तो वह अत्याचारी व निरकुंश माने जाएंगे और यदि कहेंगे कि उन्हें इस बारे में कुछ भी नहीं पता, तो अक्षम माने जाएंगे। यही वजह है कि वह सदन में आने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। संसद भवन में आना और सदन में आना दोनों अलग बातें हैं।’
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा
