

India National Character Development: भारतवासी अपनी आजादी की 79वीं वर्षगांठ अत्यंत उत्साह व गर्व से मना रहे हैं किंतु इस स्वतंत्रता का मूल्य कितने लोग समझते हैं जिसके पीछे महान क्रांतिकारियों की शहादत तथा स्वाधीनता सेनानियों का त्यागमय बलिदान था। यदि सचमुच हमें उसका बोध होता तो इतने वर्षों में हमारा राष्ट्र प्रगति के शिखर पर पहुंच गया होता।
हर देशवासी अधिकार के पहले राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को वरीयता देता और भ्रष्टाचार, मुनाफाखोरी, मिलावट व शोषण का सफाया हो गया होता। हर व्यक्ति अपने दायित्व के प्रति पूरी तरह समर्पित होता।
ऐसा क्यों नहीं हो पाया? विकास के नाम पर योजनाओं में भ्रष्टाचार, नई बनी सड़कों में गड्ढे होने, पुल हमें स्वयं से प्रश्न करना होगा कि राष्ट्र के विकास में हमारी कौन सी भूमिका और योगदान है? यह हर किसी के लिए आत्मावलोकन का विषय है। प्रश्न यह है कि इन 8 दशकों में राष्ट्रीय चरित्र क्यों नहीं बन पाया? हमारी राजनीति में दलबदल, मौकापरस्ती और नफरत के कीटाणु व्याप्त हो गए हैं।
संसद भवन की भव्यता पर असहिष्णुता व आरोप-प्रत्यारोप की ओछी राजनीति ने ग्रहण लगा दिया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इतनी कटुता पहले कभी नहीं देखी गई। व्यवस्था की जर्जरता ने युवाओं को उद्विग्न कर दिया है।
यही युवा पीढ़ी रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाए तो देश का कायापलट करने की क्षमता रखती है। सिर्फ उसे उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि अपने समय में जवाहरलाल नेहरू व नेताजी सुभाषचंद्र बोस युवाओं के आदर्श थे जिनका देश को स्वाधीनता दिलाने में महान योगदान रहा।
युवा किस तरह बदलाव लाते हैं, इसकी मिसाल है कि एलन मस्क ने 12 वर्ष की उम्र में अपना प्रोग्राम किया हुआ वीडियो गेम बेचा। मार्क जुकरबर्ग ने 21 वर्ष की आयु में एप्पल शुरू किया। लैरी पेज और सजों बिन दोनों ने 25 साल की उम्र में गूगल स्थापित किया।
ट्रिलियन डॉलर की कंपनी ऐसे युवाओं ने शुरू की जो स्टुडेंट या कॉलेज ड्रॉपआउट थे। इसके विपरीत हमारे युवा पेपरलीक, परीक्षा में धांधली, योग्यता की उपेक्षा, अवसरों की असमानता के भंवर में फंसकर छटपटा रहे हैं। हालत यह है कि विश्व के टॉप 100 विश्वविद्यालयों में भारत की एक भी यूनिवर्सिटी नहीं है।
भारत प्रतिभाशालियों की खान है लेकिन ऐसे होनहार युवा यहां अनुसंधान और तरक्की के अवसर नहीं मिलने से विदेश चले जाते हैं जहां उनके हुनर का लाभ विदेशी उठाते हैं। इस स्थिति को हमें बदलना होगा।
महात्मा गांधी ने कहा था कि साध्य के साथ ही साधन भी पवित्र होने चाहिए। हमारी राजनीति छलकपट के कीचड़ में सन चुकी है जिसमें दबाव व प्रलोभन के जरिए पार्टियां तोड़ी जाती हैं या दलबदल कराया जाता है। राजनीति में अपराध की मिलावट गंभीर समस्या है। बड़ी तादाद में सांसदों-विधायकों पर आपराधिक आरोप दर्ज हैं। चुनाव में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है।