वुजू स्वच्छता और आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतीक (सौ.सोशल मीडिया)
हर धर्म का अपना अपना रीति रिवाज एवं परंपरा होता है अगर बात इस्लाम धर्म की करें तो इस्लाम धर्म में वुजू करने की विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है। बता दें,वजू या स्नान, इस्लाम में एक ज़रूरी रस्म है, जो शारीरिक स्वच्छता और आध्यात्मिक शुद्धता दोनों का प्रतीक है।
लेकिन वुजू की व्याख्या इस्लाम में केवल मात्र इतना ही नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक है। आइए जानते हैं आखिर इस्लाम में वुजू का क्या महत्व है और नमाज पढ़ने से पहले क्यों वुजू करना होता है जरूरी.
इस्लामिक धर्म गुरु के अनुसार, मुसलमान पर नमाज फर्ज किया गया है और हर मुसलमान दिन में पांच बार नमाज अदा करते है। नमाज पढ़ने से पहले आध्यात्मिक रूप से व्यक्ति का शुद्ध होना बेहद जरूरी होता है। इसके लिए वजू या वुजू की जाती है जोकि शुद्धिकरण का महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।
इस्लाम में वजू को शुद्धता और स्वच्छता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, जिसमें व्यक्ति नमाज से पहले अपने हाथ, कान, चेहरा, मुंह, बाल और पैरों को धोता है। यह व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से शुद्ध करता है। साथ ही प्रार्थना के लिए या नमाज अदा करने के लिए तैयार करता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वुजू करने के लिए एक व्यक्ति को कम से कम 3 मिनट का समय लगता है। इस दौरान व्यक्ति मस्जिद में बने वजूखाने में बैठकर वजू करता है और फिर अल्लाह की इबादत की जाती है।
वजू का अर्थ होता है साफ-सफाई। जब हम अपने रब के सामने नमाज के लिए जाते हैं तो साफ सफाई का ध्यान रखना जरूरी होता है। नमाज करते समय मन और शरीर का साफ होना बहुत जरूरी है और इसलिए वुजू की प्रक्रिया भी कुरान में लाजमी यानी अनिवार्य बताई गई है।
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वुजू का जिक्र इस्लाम धर्म की सबसे पवित्र किताब कुरान में भी मिलता है। कुरान में कहा गया है कि- “ऐ ईमान लानेवालों! जब तुम नमाज़ के लिए उठो, तो अपने चेहरे और अपने हाथों की कोहनियों समेत धो लिया करो और अपने सिरों का मसह करो और अपने पैरों को टखनों समेत धो लो।
आपको बता दें, इस सवाल का जवाब यह है कि अगर कोई व्यक्ति जो बेहद उम्रदराज हो और उसे पानी से वुजू करने में ठंड लगती हो या किसी तरह की अन्य परेशानी हो तो इस्लाम में ऐसे व्यक्ति को वुजू न करने की छूट दी गई है जिसे तय्यमुम कहते हैं।
तय्यमुम इस्लाम में ऐसी प्रकिया को कहा जाता है जोकि पानी न होने की स्थिति में या जब पानी का उपयोग न करना हो तो इसे वुजू या गुस्ल यानी नहाने के विकल्प में प्रयोग किया जा सकता है।
बता दें, तय्यमुम भी एक प्रकार का शुद्धिकरण है। यह ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें मिट्टी वाली किसी जगह में हाथ पैर को लगाकर भी वुजू किया जा सकता है।
आप मिट्टी के स्थान पर अपना हाथ पर फेर दे तो भी इसे शुद्ध माना जाएगा। इसके अलावा जब कोई व्यक्ति तुरंत नहाकर आया हो तो उसके लिए वजू करना जरूरी नहीं होता।