

Pithori Amavasya Vrat Katha: कल10 सितंबर को पिठोरी अमावस्या मनाई जाएगी। सनातन धर्म में पिठोरी अमावस्या का बड़ा महत्व है। हिंदू धर्म में कई व्रत और पर्व ऐसे हैं, जिनका संबंध संतान की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से माना जाता है। इन्ही में से एक पिठोरी अमावस्या भी।
पिठोरी अमावस्या के दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन देवी पिठोरी, 64 योगिनियों और सप्त मातृकाओं की पूजा भी की जाती है। इस अवसर पर व्रत कथा सुनने और पूजा विधि का विशेष महत्व होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक परिवार में सात भाई रहते थे। सभी विवाहित थे और उनके बच्चे भी थे। उनकी पत्नियां हर साल श्रद्धा भाव से पिठोरी अमावस्या का व्रत करती थी।
पहले वर्ष जब सबसे बड़े भाई की पत्नी ने यह व्रत रखा, तो उसके बेटे की मृत्यु हो गई। अगले साल फिर व्रत रखा गया, लेकिन फिर किसी न किसी बेटे की मौत हो जाती। ऐसा लगातार सात वर्षों तक होता रहा। सातवें साल जब फिर बेटे की मृत्यु हुई, तो दुखी मां ने उसका शव छुपा दिया और गांव की कुलदेवी मां पोलेरम्मा के पास गई।
सातवें वर्ष भी वही हृदयविदारक घटना घटी। गहरे शोक में डूबी उस माँ ने अपने मृत पुत्र के शव को एक स्थान पर छिपा दिया था। उसी समय गाँव की रक्षा करने वाली कुलदेवी माँ पोलेरम्मा वहाँ से गुजर रही थीं। उस माँ की आँखों में अपार वेदना देखकर देवी रुकीं और उनसे उनके दुख का कारण पूछा।
मां पोलेरम्मा ने जब उसकी व्यथा सुनी तो उसे हल्दी लेकर उन स्थानों पर छिड़कने को कहा जहां उसके बेटों का अंतिम संस्कार हुआ था। महिला ने वैसा ही किया। जब वह घर लौटी तो देखा कि उसके सातों बेटे जीवित हो गए हैं। इस चमत्कार को देखकर गांव की सभी महिलाएं श्रद्धा से भर उठीं और तभी से संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए पिठोरी अमावस्या का व्रत करने की परंपरा शुरू हो गई।