पाकिस्तान से जुड़ा है किस्सा ( कांसेप्ट सोशल मीडिया)
नई दिल्ली : पाकिस्तान में गुरुद्वारा सत्य सौदा साहिब वह जगह है जहां लंगर परंपरा शुरू हुई, जो आज दुनिया भर में सिखों की पहचान का प्रतिनिधित्व करती है। सिख अपनी भक्ति और सेवा भावना के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। लंगर की परंपरा 500 साल पहले शुरू हुई थी।
बता दें कि जब श्री गुरु नानक साहिब 15 या 16 वर्ष के थे, तब उनके पिता मेहता कालू ने उन्हें 20 रुपये देकर फारूकाबाद में व्यापार करने के लिए भेज दिया था। उस समय यह श्री ननकाना साहिब गुरुद्वारा से पैदल दूरी पर एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक केंद्र था।
पिता जी (मेहता कालू) ने बाबा गुरु नानक साहिब को व्यापार के लिए 20 रुपये दिये। बाबा नानक व्यापार के सिलसिले में बाहर गये हुए थे। इसी समय रास्ते में उनकी मुलाकात भूखे साधुओं से हुई। साधु ने बाबा को बताया कि वह पिछले कुछ दिनों से भूखा है। जैसे ही बाबा को इस बात का पता चला तो उन्होंने उन्हें भोजन के लिए कुछ पैसे दिए, लेकिन साधुओं ने उनसे पैसे लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि हम पैसे नहीं लेंगे और यह भी कहा कि हम खाना अपने हाथ से बना कर खायेंगे।
इसके साथ ही ये सुनकर श्री गुरु नानक साहिब बहुत प्रसन्न हुए और अपने साथियों के साथ साधु के लिए भोजन बनाने लगे। सभी संतों ने बड़े स्वाद से भोजन किया। बाबा नानक ने अपनी सारी संपत्ति साधुओं को खाना खिलाने में खर्च कर दी। पैसे ख़त्म होने के बाद पिताजी खाली हाथ घर लौट आये। उसने अपने पिता मेहता कालू को दिखाने के लिए कुछ भी नहीं खरीदा था। साधुओं को भोजन कराने के बाद बाबा गुरु नानक साहब तेलवंडी (ननकाना साहिब) गांव पहुंचे।
बाबा गुरु नानक साहिब ( कांसेप्ट सोशल मीडिया)
गाँव पहुंचने के बाद बाबा अपने घर नहीं गए क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पिता नाराज होंगे। बाबाजी अपने घर के पास झाड़ियों में छिपकर बैठे रहे। जब परिवार वालों को पता चला कि बाबा नानक साहब घर नहीं लौटे हैं तो वे बहुत डर गये। वह तुरंत बाबा की तलाश में निकल पड़ें । काफी खोजबीन के बाद बाबा नानक साहब मिले। बाबाजी के पिता ने जब सुना कि 20 रुपये खर्च हो गये हैं तो वे बहुत क्रोधित हो गए। परिवार और पड़ोसियों के समझाने पर बाबा गुरु नानक साहब का गुस्सा शांत हुआ। जिस स्थान पर बाबा गुरु नानक साहिब छुपे थे उसे अब गुरुद्वारा तंबू साहिब के नाम से जाना जाता है।