Premanand Maharaj (Source. Pinterest)
Premanand Maharaj Love Meaning: जब एक भक्त ने श्री प्रेमानंद जी महराज से सवाल किया की मेरे लाड़ले आत्माओं, आज तुम मुझसे पूछते हो कि प्रेम में डूबे एक भक्त की स्थिति कैसी होती है? इस प्रश्न का उत्तर स्वयं में बेहद गहरा है। सच्चाई यह है कि प्रेम एक ऐसा अनुभव है, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
यह एक आंतरिक रस है, जिसे केवल वही महसूस कर सकता है, जिसके हृदय में यह जागृत होता है। बाहर से हम जितना भी समझने की कोशिश करें, प्रेम की वास्तविकता उससे कहीं अधिक गहन होती है।
प्रेम अपने आप नहीं आता, बल्कि यह गुरु और आचार्य की कृपा से जागृत होता है। जब साधक निरंतर नाम जप, शास्त्रों का अध्ययन, कथा श्रवण और कीर्तन में लीन रहता है, तब उसके हृदय में प्रेम का अंकुर फूटता है। श्री प्रेमानंद जी महराज बताते है, “जब प्रेम का प्रवाह चलता है, तब वह भक्त लोक रीति और वेद रीति, दोनों को नमस्कार करके केवल अपने प्रीतम के ही चिंतन में मगन हो जाता है।” इस अवस्था में भक्त की बाहरी गतिविधियां तो चलती रहती हैं, लेकिन भीतर से वह पूरी तरह अपने प्रभु में डूबा होता है।
जिस व्यक्ति के भीतर प्रेम जागृत हो जाता है, उसके लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं:
उसके लिए संसार के सभी विषय ‘खारे’ यानी कड़वे हो जाते हैं।
प्रेम की चरम स्थिति तब आती है जब भक्त अपना मन पूरी तरह भगवान को समर्पित कर देता है। “उद्धव मन न भए दस बीस” इस कथन का अर्थ है कि प्रेमी के पास एक ही मन होता है, जो वह अपने प्रभु को अर्पित कर देता है। इसके बाद उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहता। वह न किसी की सुनता है और न किसी को समझाता है, बस दिन-रात अपने आराध्य की माधुरी में खोया रहता है।
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प्रेमी भक्त बाहर से सामान्य दिख सकता है, लेकिन भीतर से वह पूरी तरह एकांत में होता है। वह अपने प्रीतम की लीला, रूप और नाम में ही डूबा रहता है। उसकी स्थिति इतनी गहरी और अलौकिक होती है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना लगभग असंभव है। वह जहां भी रहता है, उसका मन हमेशा प्रभु के धाम में ही स्थित रहता है।
आखिर में प्रेमानंद जी महाराज कहते है, “इसलिए मेरे पागलों, इस संसार के मिथ्या प्रपंचों को छोड़ो और उस नाम रस में डूबो, जहाँ पहुँचने के बाद फिर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।”