Shivling Puja Mistakes: शिवलिंग की पूजा में भूल से भी न करें ये गलतियां, सब हो जाएगा उलटा!
Shivling Puja Niyam In Hindi: शिवलिंग की पूजा करते समय कुछ गलतियों से बचना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यता है कि नियमों का पालन न करने पर पूजा का फल कम हो सकता है।
- Written By: सीमा कुमारी
शिवलिंग (सौ.सोशल मीडिया)
Shiva Puja Ke Niyam Aur Galtiyan : वैशाख माह का अंतिम प्रदोष व्रत 28 अप्रैल, मंगलवार के दिन रखा जाएगा। मंगलवार के दिन जो प्रदोष व्रत पड़ता है, वो भौम प्रदोष व्रत कहलाता है। ऐसे में ये भौम प्रदोष व्रत रहेगा। प्रदोष व्रत को भगवान शिव की कृपा पाने का सबसे शुभ दिन माना जाता है। खासकर वैशाख माह का अंतिम प्रदोष व्रत आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
इस दिन भक्त बड़ी श्रद्धा से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं, लेकिन अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे पूजा का पूरा फल नहीं मिलता है। शास्त्रों में महादेव की पूजा के कुछ नियम बताए गए हैं। अगर आप इस प्रदोष व्रत पर अपनी मनोकामना पूरी करना चाहते हैं, तो इन 5 बड़ी गलतियों से जरूर बचें।
शिवलिंग पूजा के दौरान न करें ये बड़ी गलतियां
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ये चीजें चढ़ाना वर्जित
शिवपुराण में शिवलिंग (Shivling Puja) पर कुछ चीजें चढ़ाना पूरी तरह वर्जित बताया गया है। भगवान शिव को सिंदूर, कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता। पूजा में इसकी जगह चंदन या भस्म का प्रयोग करें। इसके अलावा तुलसी दल, केतकी के फूल और नारियल पानी भी शिवलिंग पर अर्पित न करें। शंख से शिवलिंग का अभिषेक भी वर्जित माना गया है, क्योंकि शिवजी ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था।
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तांबे के लोटे से दूध चढ़ाना वर्जित
शिवपुराण में ये भी बताया गया है कि,शिवलिंग पर तांबे के लोटे से दूध चढ़ाना वर्जित बताया गया है। अक्सर लोग तांबे के लोटे में दूध डालकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। तांबे के साथ दूध का संपर्क उसे विष के समान बना देता है।
ऐसे में महादेव को दूध चढ़ाने के लिए हमेशा पीतल, चांदी या स्टील के पात्र का ही प्रयोग करें। तांबे के पात्र का उपयोग केवल जल चढ़ाने के लिए ही शुभ होता है।
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शिवलिंग की पूरी परिक्रमा न करे
धर्म शास्त्रों के अनुसार, शिवलिंग की पूजा में सबसे बड़ी गलती परिक्रमा के दौरान होती है। याद रखें, शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। जहां से अभिषेक का जल बाहर निकलता है। उसे लांघना घोर पाप माना जाता है। ऐसे में हमेशा आधी परिक्रमा करें और वहीं से वापस लौट आएं।
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प्रदोष काल का ध्यान न रखना
प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा सूर्यास्त के समय यानी ‘प्रदोष काल’ में ही की जानी चाहिए। दिन के समय की गई सामान्य पूजा और शाम की विशेष पूजा में बड़ा अंतर है। वैशाख के इस अंतिम प्रदोष पर सूर्यास्त के 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद तक का समय शिव साधना के लिए सबसे शुभ माना जाता है।
