Satua Sankranti : सतुआन त्यौहार आज, जानिए मेष संक्रांति पर सत्तू खाने की परंपरा के पीछे की वैज्ञानिक वजहें
Satua Sankranti Festival In India: सतुआन त्यौहार के दिन मेष संक्रांति पर सत्तू खाने की परंपरा सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी बेहद फायदेमंद मानी जाती है।
- Written By: सीमा कुमारी
सतुआन त्यौहार (सौ.सोशल मीडिया)
Science Behind Eating Sattu On Mesha Sankranti: आज सतुआ संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा हैं। सनातन धर्म में इस संक्रांति का विशेष महत्व हैं। खासतौर पर , उत्तर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड आदि राज्यों में अलग ही धूम देखने को मिलती हैं। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष, सतुआ संक्रांति का पर्व 14 अप्रैल 2026, मंगलवार के दिन मनाया जा रहा हैं।
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शुभ एवं मांगलिक कार्य की शुरुआत
सूर्यदेव के मेष राशि में जाते ही खरमास समाप्त हो जाता है और सभी मांगलिक कार्य जैसे शादी, सगाई और गृहप्रवेश आदि प्रारंभ हो जाते हैं। सूर्य के मेष में प्रवेश करते ही दिन भी बड़े होने लगते हैं।
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जूड़ शीतल और सतुआ संक्रांति का महत्व
लोक मान्यता के अनुसार, परिवर्तन के साथ भारतीय परंपरा में कई नए त्योहार जुड़ते हैं, जिनमें जूड़ शीतल और सतुआ संक्रांति (Satua Sankranti) भी त्योहार मनाए जाते हैं। जिसका अपना अलग ही महत्व हैं। बताया जाता हैं कि, यह पर्व न सिर्फ मौसम के बदलाव का संकेत देता है, बल्कि जीवनशैली और खानपान में भी परिवर्तन लाने का संदेश देता है। इस दिन से गर्मी की शुरुआत मानी जाती है, इसलिए शरीर को ठंडक देने वाले खाद्य पदार्थों को अपनाने की परंपरा रही है।
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सत्तू से जुड़ा स्वास्थ्य और परंपरा
सतुआ संक्रांति पर सत्तू खाने और दान करने की परंपरा है। सत्तू भुने हुए चने या जौ से बना पौष्टिक आहार है, जो शरीर को ठंडक देता है, ऊर्जा बढ़ाता है और पाचन के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। इसमें प्रोटीन, फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जो गर्मियों में शरीर को संतुलित रखते हैं।
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प्रकृति और शरीर के संतुलन का संदेश
जूड़ शीतल के दिन पेड़-पौधों को जल चढ़ाने और प्रकृति की सेवा करने की परंपरा भी है। यह त्योहार हमें पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रखने और शरीर को मौसम के अनुसार ढालने की सीख देता है। इस तरह ये पर्व सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, प्रकृति और जीवनशैली से जुड़ा एक समग्र संदेश भी देते हैं।
यह पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, बिहार और नेपाल में मनाया जाता है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। इस दिन सत्तू खाने की परंपरा होती हैं। साथ ही सत्तू, घड़े में भरा पानी, गुड़, लोटा, छाता आदि वस्तुओं का दान भी किया जाता हैं।
