

Shri Premanand Ji Maharaj का यह कथन केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन की कड़वी सच्चाई है। मनुष्य अपने जीवन की यात्रा में अक्सर यह भूल जाता है कि उसके हर विचार, हर कर्म और हर पल का सूक्ष्म हिसाब रखा जा रहा है। कामना यानी इच्छाएं आध्यात्मिक प्रगति की सबसे बड़ी शत्रु हैं। इन्हीं इच्छाओं के वश होकर इंसान छल, कपट और गलत रास्ते अपनाता है और सोचता है कि वह जीत रहा है, जबकि वास्तव में वह अपने दुखों का बीज बो रहा होता है।
शास्त्रों के नियमों के खिलाफ किया गया हर आचरण पाप होता है, जिसे 'विकर्म' कहा गया है। इसका बोझ इतना भयावह होता है कि केवल ईश्वर की कृपा ही इसे नष्ट कर सकती है। कर्म की गति बहुत तेज होती है और इसका परिणाम टल नहीं सकता।
मानव जीवन में कर्म तीन प्रकार के होते हैं:
कर्म के नियम इतने कठोर हैं कि देवता भी इससे अछूते नहीं रहे। देवराज इंद्र को अहिल्या के साथ दुराचार के कारण गौतम ऋषि का श्राप झेलना पड़ा। उनके शरीर पर हजारों दुर्गंधयुक्त चिह्न उभर आए एक तरह का "जीता-जागता नरक"। अंततः भगवान राम की शरण में जाकर ही उन्हें मुक्ति मिली। यह घटना सिखाती है कि कर्म का फल अटल है।
हम जिस परिवार में जन्म लेते हैं पुत्र, पिता या मित्र बनकर यह संयोग नहीं, बल्कि ऋणानुबंध है। हम या तो पुराने ऋण चुकाने आए हैं या वसूलने। सुख-दुख का यह हिसाब कई जन्मों से चला आ रहा होता है।
जन्म-मरण के इस "व्यापार" को बंद करने का सरल उपाय है:
जीवन मुक्त होने का लक्ष्य कठिन है, इसलिए समर्पण सबसे सरल उपाय है। हर दिन अपने कर्मों की समीक्षा करें, गलत विचारों को लिखें और शक्ति मांगें। अच्छे कर्म भगवान को अर्पित करते हुए कहें "श्री कृष्णर्पणमस्तु"। जब मन में हर समय नारायण का नाम और मृत्यु की सच्चाई रहे, तो गंदे कर्म अपने आप छूट जाते हैं। पूर्ण समर्पण करने पर भगवान स्वयं हमारे कर्मों का हिसाब संभाल लेते हैं।