

Shishupal Killed By Krishna: भारतीय पुराणों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो आज भी जीवन का बड़ा संदेश देते हैं। ऐसी ही एक कथा है चेदि के राजकुमार Shishupal की, जिनका अंत स्वयं Krishna के हाथों हुआ। यह कहानी केवल द्वेष और अहंकार की नहीं, बल्कि क्षमा की सीमा की भी है।
शिशुपाल, चेदि नरेश धमघोष के पुत्र थे। पौराणिक मान्यता के अनुसार वे भगवान विष्णु के पार्षद 'जया' का अवतार थे, जिन्हें श्राप मिला था कि वे तीन बार धरती पर जन्म लेकर भगवान विष्णु के हाथों मारे जाएंगे। उनका जन्म असामान्य था तीन आंखें और चार भुजाएं। उनकी माता भयभीत हो उठीं। तभी आकाशवाणी हुई कि जब यह बालक अपने वध करने वाले की गोद में बैठेगा, तब उसकी अतिरिक्त आंख और भुजाएं लुप्त हो जाएंगी। जब कृष्ण चेदि पहुंचे और शिशुपाल को गोद में लिया, तो भविष्यवाणी सच हो गई। यह देखकर शिशुपाल की माता ने कृष्ण से वचन लिया कि वे उसके सौ अपराधों तक क्षमा करेंगे।
समय बीता और विदर्भ की राजकुमारी रुक्मणी का विवाह शिशुपाल से तय हुआ। लेकिन रुक्मिणी मन ही मन कृष्ण से प्रेम करती थीं। उन्होंने पत्र लिखकर कृष्ण से सहायता मांगी। कृष्ण ने रुक्मिणी का हरण कर उनसे विवाह कर लिया। यह घटना शिशुपाल के अहंकार पर गहरा आघात थी। इसके बाद उसने कृष्ण का अपमान करने और उन्हें नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा।
पांडवों के Rajasuya Yagya में कृष्ण को विशेष अतिथि के रूप में सम्मानित किया गया। यह देखकर शिशुपाल ईर्ष्या से भर उठा। उसने सभा में कृष्ण, भीष्म और कुंती तक का अपमान किया। कृष्ण शांत रहे। वे मुस्कुराते हुए उसकी गिनती करते रहे। जब शिशुपाल ने 99 अपराध पूरे किए, तो कृष्ण ने चेतावनी दी। लेकिन वह नहीं रुका। जैसे ही उसने सौवीं गलती की, कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया।
यह प्रसंग सिखाता है कि क्षमा महान गुण है, लेकिन उसकी भी सीमा होती है। यदि अपराधी को समय पर दंड न मिले, तो उसका साहस बढ़ता है और समाज को अधिक हानि पहुंचती है। शिशुपाल की कथा हमें याद दिलाती है कि अन्याय और अहंकार का अंत निश्चित है चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।