पापमोचनी एकादशी का क्या है महत्व? जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा
Papmochani Ekadashi: पापमोचनी एकादशी हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत रखने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है।
- Written By: सीमा कुमारी
भगवान विष्णु (सौ. AI)
Papmochani Ekadashi Importance: हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व हैं। हर महीने दो पक्षों में एकादशी का व्रत रखा जाता है। पहला कृष्ण और दूसरा शुक्ल पक्ष में। इस साल चैत्र महीने की एकादशी यानी पापमोचनी एकादशी का व्रत 15 मार्च 2026, रविवार को रखा जाएगा। वहीं इसका पारण 16 मार्च को किया जाएगा।
एकादशी का व्रत आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक
एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित हैं। यह व्रत आत्म-शुद्धि, मन की शांति, और पापों के नाश के लिए किया जाता है। इस दिन चावल का सेवन वर्जित है और विष्णु जी की आराधना कर सात्विक उपवास रखने से मोक्ष और सुख-समृद्धि मिलती है।
पापमोचनी एकादशी का व्रत महत्व
हिन्दू धर्म में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है। इसे पापों का नाश करने वाली एकादशी माना जाता है। इस दिन भक्त विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और व्रत रखते है।
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शास्त्रों में बताया गया है कि, इस व्रत को करने से जीवन में जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश होता है। साथ ही मानसिक शांति और पुण्य की प्राप्ति होती है।
आखिर क्यों मनाई जाती है पापमोचनी एकादशी?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, किसी समय की बात है कि एक ऋषि वन में भगवान शिव की कठोर तपस्या कर रहे थे। उनकी गहन तपस्या को देखकर इंद्र को भय होने लगा कि कहीं ऋषि अपनी तपस्या से बड़ा वरदान प्राप्त न कर लें। इसलिए उन्होंने ऋषि की तपस्या भंग कराने के लिए मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा को भेजा।
मंजुघोषा की अद्भुत सुंदरता और मधुर संगीत से ऋषि मोहित हो गए और उनकी तपस्या भंग हो गई। इसके बाद ऋषि और मंजुघोषा कई वर्षों तक साथ रहने लगे।
कुछ समय बाद मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की इच्छा प्रकट की। यह सुनकर ऋषि को बहुत क्रोध आया। उन्हें एहसास हुआ कि छल से उनकी तपस्या भंग करवाई गई थी। क्रोधित होकर उन्होंने मंजुघोषा को पिशाचिनी बनने का श्राप दे दिया।
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श्राप मिलने के बाद मंजुघोषा ने ऋषि से क्षमा याचना की। तब ऋषि ने उसे प्रायश्चित के रूप में का व्रत करने का उपाय बताया। मंजुघोषा ने श्रद्धा से यह व्रत किया। स्वयं ऋषि ने भी अपनी तपस्या भंग होने के प्रायश्चित के लिए यह व्रत रखा।
इस व्रत के प्रभाव से मंजुघोषा पिशाच योनि से मुक्त होकर पुनः अप्सरा बन गई और ऋषि के भी सभी पाप नष्ट हो गए।
