जानिए माह-ए-रमजान की किस रात नाजिल हुआ कुरान शरीफ, कितनी रात लग गए
इस्लाम धर्म में पाक ग्रंथ के तौर पर कुरान को जाना जाता है इसमें धर्म से जुड़े कई अध्याय है। इसे दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब का दर्जा मिला है। यह अल्लाह के द्वारा भेजी गई अंतिम किताब है।
- Written By: दीपिका पाल
किस रात नाजिल हुआ कुरान शरीफ (सौ.सोशल मीडिया)
Quran Revelation: इन दिनों रमजान का महीना चल रहा है इसमें इस्लाम धर्म के लोग रोजा के नियम कर रहे है। रमजान महीने के खत्म होते ही ईद-उल-फित्र मनाया जाता है। ईद के मौके पर मुस्लिम बंधु मस्जिद में जाकर नमाज अदा करते है और अपनी जिंदगी में खुशहाली की इबादत करते है। इस्लाम धर्म में पाक ग्रंथ के तौर पर कुरान को जाना जाता है इसमें धर्म से जुड़े कई अध्याय है। इसे दुनिया में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब का दर्जा मिला है वहीं यह किताब एक आसमानी और अल्लाह के द्वारा भेजी गई अंतिम किताब है. इसे अल्लाह ने अपने फरिश्ते (देवदूत) जिब्राइल के जरिए पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब तक पहुंचाया। चलिए जानते है कितनी रात लगी कुरान के उतरने में।
पहली आयत पर उतारी गई आयत
आपको बताते चलें कि, रमजान के महीने में कुरान की पहली आयत आसमान से उतारी गई इसे लाने वाले हजरत मोहम्मद साहब है जो आखिरी पैगंबर है। यहां पर बताया जाता है कि, कुरान की सूरह अलबकरा की आयत 185 में अल्लाह फरमाते हैं कि रमजान व महीना है जिसमें आसमान से कुरान को उतारा गया। बताया जाता है कि, इस्लाम धर्म की पवित्र किताब कुरान को उतारने में 23 साल लग गए। रमजान के महीने में कुरान के नाजिल होने का सबूत मिलता है, 610 ईस्वी में रमजान के महीने में, जब पैगंबर मुहम्मद 40 वर्ष के थे।
रमजान के महीने में हिरा की गुफा में पैगंबर मोहम्मद साहब अल्लाह की इबादत कर रहे थे। अनुमान के मुताबिक, रमजान के आखिरी असरा में यानी अंतिम दस दिनों में ताक रातें जैसे 21, 23, 25, 27 में से कोई एक रात है, जिसमें कुरान नाजिल हुई. इसीलिए रमजान को तालीम का महीना माना जाता है. इन रातो को लैलतुल क़द्र (फ़ैसला की रात) रात मानी जाती है।
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27वीं रात में उतारी गई थी कुरान
इस्लाम धर्म के मुताबिक, पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने लैलतुल कद्र के अनुसार कहा गया कि, यह 27वीं रात है. (अबू दाउद तैलिसी) अबू हुरैरा की एक अन्य रिवायत के अनुसार, यह रमज़ान की आखिरी रात है इस दिन ही कुरान को उतारा गया है। कुरान को लेकर कहा जाता है कि, यह एक मुकम्मल किताब है, जिसमें कोई छेड़छाड़ या बदलाव नहीं हुआ है. कभी कोई छेड़छाड़ या बदलाव नहीं हुए और न भविष्य में हो सकते हैं। इसमें किसी तरह की कांट-छांट कर ही नहीं सकता. इस्लाम का अकीदा यह है कि अल्लाह ने खुद इस किताब की हिफाजत (रक्षा) की जिम्मेदारी ली है।
किसने और कब दिया किताब का स्वरूप
इस्लाम के धर्म कहते हैं कि, पैगंबर मुहम्मद की 632 ईसवीं वफात (निधन) के बाद खलीफा हजरत अबु बकर ने 934 ईसवीं के बाद कुरान को एक ग्रंथ या किताब बनाने का विचार किया ताकि, अध्याय और सूरह को संरक्षित रखा जा सकें। इसके लिए जैद बिन साबित (655 ई) कुरान को इकट्ठा करने वाले पहले व्यक्ति थे, क्योंकि वह अल्लाह के नबी मुहम्मद के द्वारा पढ़ी गई आयतों और सूरों को लिखा करते थे।
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बताया जाता है कि, ज़ैद बिन साबित ने ही आयतों को एकत्र कर कुरान को किताब का रूप दिया. इसकी मूल प्रति अबू बकर को मिली।कुरान में कुल 30 पारे हैं और उन्हें 114 अध्यायों में बांटा गया है. अध्याय को सूरह कहते हैं. हर सूरह को एक नाम दिया गया. सूरह में आयतें होती हैं. आयत एक वाक्य होता है. कुरान में कुल 6,666 आयतें हैं. कुछ आयतें बहुत छोटी हैं और कुछ बड़ी. कुरान की सबसे बड़ी सूरह अल-बकरा है. इसमें 286 आयतें हैं. सबसे छोटी सूरह अल-कौसर है. इसमें सिर्फ तीन आयतें हैं।
