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रक्षाबंधन के दिन ही मनाई जाती है ‘नारली पूर्णिमा’, जानिए कौन और क्यों मनाते हैं
Narali Purnima : सावन पूर्णिमा के दिन जहां उत्तर भारत में ‘रक्षाबंधन’ का त्योहार मनाया जाता है तो वहीं, दक्षिण भारत यानी विशेष रूप से महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में ‘नारियल पूर्णिमा’ मनाया जाता है।
- Written By: सीमा कुमारी

नारली पूर्णिमा (सौ.सोशल मीडिया)
Narali Purnima 2025 : रक्षाबंधन हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हर साल उत्तर भारत सहित अलग-अलग हिस्सों में धूमधाम एवं हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। रक्षाबंधन जो हर साल हिंदू पंचांग में सावन की पूर्णिमा तिथि में न केवल रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है, बल्कि समुद्र से जुड़े समुदायों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण दिन होती है वो है नारली पूर्णिमा।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, नारली पूर्णिमा मछुआरा समुदाय का प्रमुख पर्व है जिसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र, कोंकण, गोवा और दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह त्योहार कल 9 अगस्त 2025 को मनाई जा रही है। धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से मछुआरा समाज में इस त्योहार का बड़ा महत्व है।
आपको बता दें “नारली पूर्णिमा” का शाब्दिक अर्थ है “नारियल चढ़ाने वाली पूर्णिमा.” यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। मछुआरे समुद्र को ‘समुद्र देवता’ मानते हैं, क्योंकि समुद्र उन्हें आजीविका देते हैं और जीवन निर्वाह का माध्यम है।
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इसलिए इस दिन मछुआरा समाज के लोग उनकी सच्चे मन से पूजा-अर्चना करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं नारली पूर्णिमा 2025 कब है, इस दिन मछुआरे क्या करते हैं।
क्या है नारली पूर्णिमा 2025 की सही तिथि
आपको बता दें, इस साल नारियल यानी नारली पूर्णिमा 9 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। श्रावण पूर्णिमा को महाराष्ट्र में, मुख्यतः तटीय एवं कोंकणी क्षेत्रों में नारियल पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है।
नारली पूर्णिमा 2025 का शुभ मुहूर्त :
सावन पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- अगस्त 08, 2025 को दोपहर 2:12 बजे
सावन पूर्णिमा तिथि समाप्त- अगस्त 09, 2025 को दोपहर 1:24 बजे
पूजा मुहूर्त-
सुबह 7.27 – सुबह 9.07
दोपहर 12.26 – दोपहर 2.06
आखिर क्यों मनाते हैं नारली पूर्णिमा
मछुआरा समुदाय में नारली पूर्णिमा का बड़ा महत्व होता है। ये पावन दिन समुद्र देवता वरुण को समर्पित है। नारली पूर्णिमा पर नारियल का विशेष महत्व होता है। नारियल पूर्णिमा के अवसर पर भक्तगण वरुण देव की पूजा करते हैं तथा समुद्र के देवता को नारियल अर्पित करते है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर समुद्र पूजन करने से समुद्र देव प्रसन्न होते हैं तथा मछुआरों की समस्त प्रकार की अशुभ घटनाओं से उनकी रक्षा करते हैं।
यह त्योहार मछुआरों के लिए मछली पकड़ने और जल-व्यापार की शुरुआत का प्रतीक होता है। यह भी माना जाता है कि इस दिन के बाद समुद्र की हवाओं की दिशा और उनकी तीव्रता मछली पकड़ने के अनुकूल हो जाती है।
ऐसे मनाई जाती है ‘नारली पूर्णिमा’
आपको बता दें, धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से मछुआरा समाज में इस त्योहार का बड़ा महत्व है। नृत्य और संगीत पर्व का अभिन्न हिस्सा है। इस त्योहार में पारंपरिक भोजन में मीठे नारियल चावल बनाए जाते हैं, जिन्हें करी के साथ बड़े चाव से खाया जाता है।
उत्सव के दौरान समुद्र में वरुण देवता को नारियल अर्पित किया जाता है और जल व्यापार की सफलती का कामना की जाती है।
मछुआरों के लिए समुद्र पवित्र है क्योंकि यह उनके जीवनयापन का साधन है। नारली पूर्णिमा के दिन वे नावों की पूजा भी करते हैं।
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नारली पूर्णिमा पर समुद्र में क्यों चढ़ाते हैं नारियल
हिंदू धर्म के सभी त्योहारों में नारियल को शुभ और पवित्र माना जाता है इसलिए समुद्र देवता को नारियल अर्पित करना उन्हें प्रसन्न करने का एक माध्यम माना जाता है, जिससे जल यात्रा सुरक्षित और सफल हो सके।
Narali purnima is celebrated on the day of rakshabandhan
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