Muharram 2026: मुहर्रम में क्यों मनाया जाता है मातम? जानिए यौम-ए-अशूरा और कर्बला के इतिहास का सच

Muharram Mourning : मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, लेकिन इसे खुशी के बजाय शोक और स्मरण के रूप में मनाया जाता है। खासकर यौम-ए-अशूरा के दिन कर्बला की ऐतिहासिक घटना को याद किया जाता है।
Why Muharram Is Observed
मुहर्रम इस्लामिक नया साल (सौ.जैमिनी)
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Why Muharram Is Observed: इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत मुहर्रम के पाक महीने से होती हैं। मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर के चार पाक महीनों में से एक है, जिसके पहले 10 दिन मातम के कहलाते हैं। जिसका संबंध कर्बला की जंग और इमाम हुसैन की शहादत बताया जाता हैं। इस्लामिक धर्म गुरु के अनुसार, मुहर्रम के पाक महीने से इस्लामिक कैलेंडर की शुरुआत मानी जाती हैं।

नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक मुहर्रम

मुहर्रम के महीने से इस्लाम धर्म में नया साल शुरू होता हैं। ये इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता हैं। ईद और ​बकरीद की तरह ही चांद नजर आने के बाद इस पाक माह के शुरुआत की तारीख तय की जाती है. भारत में आज माहे मुहर्रम की पहली तारीख है। मुहर्रम की दसवीं तारीख (यौमे आशूरा) शुक्रवार 26 जून को है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार, मुहर्रम महीने में किसी भी प्रकार की कोई लड़ाई नहीं की जाती. इस्लाम में इसको शोक का महीना माना जाता है।

कब से शुरू होगा मुहर्रम?

सबसे पहले तो यह जान लेना जरूरी है कि मुहर्रम कोई पर्व नहीं बल्कि इस्लामिक कैलेंडर का वो पाक महीना है जो इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ा हुआ है। मुहर्रम महीने की शुरुआत भी ईद और ​बकरीद की तरह चांद के दिखने पर ही तय होती है। शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास के अनुसार आज रात को दिखने वाले चांद से ही मुहर्रम की तारीख तय होगी।

मुहर्रम को क्यों माना जाता है शोक का महीना?

मौलाना यासूब अब्बास के अनुसार, मुहर्रम महीने में मनाए जाने वाले मातम की शुरुआत इस पाक महीने के पहली रात से होती है और यह 10 दिनों तक चलता है। गौरतलब है कि इसी महीने के 10 दिनों तक यजीद ने इमाम हुसैन के अनुयायियों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को पानी पीने तक के लिए नहीं दिया गया और उन्हें तमाम तरह की यातनाएं दी गई थीं। जिनमें से अधिकांश इमाम हुसैन के साथ कर्बला की लड़ाई में शहीद हो गये थे।

बताया जाता है कि, मुहर्रम महीने के दसवें दिन यौम-ए-अशूरा पड़ता है, जिसमें ताजिए निकालकर शोक मनाया जाता है, यही वो दिन है जिस दिन मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ भूखे प्यासे शहीद हुए थे।

इमाम हुसैन की याद में शिया मुसलमान 9 से 10 मुहर्रम तक अपने सिर पर तेल और कंघी का प्रयोग तक नहीं करते हैं। बगैर बाल और दाढ़ी बनाए हम करबला वालों की याद में गमजदा रहते है। शिया मुसलमान 10 मुहर्रम को फाका रखते हैं, फाका मतलब पूरे दिन भूखे प्यासा रहना बस तकरीबन 4-5 बजे यानि असर की नमाज के वक्त हम लोग फाका शिकनी यानी गम का खाना खाते है। इसी महीने में इमाम हुसैन को प्यासा शहीद किया गया था, इसलिए उनकी याद में सबीले लगती हैं. लंगर लगाकर लोगों को खाना खिलाया जाता है।

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