Muharram 2026: कब शुरू होगा इस्लामिक नया साल? जानें मुहर्रम और ताजिया की परंपरा

Muharram: मुहर्रम में हजरत इमाम हुसैन को याद किया जाएगा। 16 जून को चांद दिखने के बाद इस्लामिक माह मोहर्रम शुरू होगा। मुहर्रम वह समय है जब अल्लाह ने युद्ध करना मना किया है।
Muharram 2026 Kab hai, kya hai tazia ki kahani
मुहर्रम (फोटो.एआई)
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Muharram Kab Hai: इस्लामी नव वर्ष के पहले महीने को मुहर्रम कहा जाता है। नए चांद (हिलाल) के नजर आने के साथ ही मुहर्रम की शुरुआत होती है। इस्लाम धर्म से जुड़े सभी त्योहार चांद के अनुसार मनाए जाते हैं।

मुहर्रम की शुरुआत अमावस्या के बाद पहला आधा चांद देखने के बाद किया जाता है। हालांकि मुहर्रम की तिथि, स्थान और चांद को देखने की विधि के आधार पर अलग भी हो सकती है। यही कारण है कि अलग-अलग देशों में मुहर्रम की तिथि अलग होती है। सऊदी में एक दिन पहले, लेकिन एशियाई देशों में एक दिन बाद इस्लामिक त्योहार मनाए जाते हैं। 16 जून को चांद नजर आता है, तो 25 जून को यौम-ए-आशूरा होगा।

क्या है ताजिया की परंपरा

सन 61 हिजरी में कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन और उनके परिजनों, जानिसारों की शहादत ओर शुजाअत याद कर अकीदतमंदों की आंखों से अनुधारा फूट पड़ती है। मोहर्रम की 9वीं रात को हजरत इमाम हुसैन ने रात भर इबादत की थी। मोहर्रम की 10वीं तारीख को अत्याचारी शासक यजीद की 22 हजार की विशाल फौज के सामने हजरत इमाम हुसैन के 72 जानिसारों का काफिला सच्चाई और मानवता के लिए लड़ा और अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

कालांतर में तैमूर हजरत इमाम हुसैन के रोज्जे पर जियारत को हाजिर होते थे। एक बार उनके बीमार होने पर जियारत से महरूम रहने की चिंता हो गई। उनके वजीरों ने करबला में स्थित हजरत इमाम हुसैन के रोजा मुबारक की प्रतिकृति तैयार कर जियारत करवाई और तभी से तजियादारी की परंपरा शुरू हुई।

क्या है यौम-ए-आशूरा

‘आशूरा’ का मतलब होता है ‘दस’ या ‘दसवां’। मुहर्रम की 10वीं तारीख को यौम-ए-आशूरा मनाया जाता है। इस दिन मुस्लिम समुदाय खासकर शिया मुसलमान, हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं और शोक मनाते हैं। इस्लामिक मान्यता अनुसार, पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष किया था। मुहर्रम की 10वीं तारीख को उन्हें उनके परिवार और साथियों सहित शहीद कर दिया गया था। इस्लाम में इमाम हुसैन की कुर्बानी सत्य, न्याय और मानवता के लिए सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक माना जाता है।

इस दिन इमाम हुसैन की शहादत और कर्बला की घटना को याद करते हुए कई स्थानों पर ताजिया जुलूस निकाले जाते हैं और मजलिसों का आयोजन होता है। मुसलमान श्रद्धा, परंपरा और सम्मान के साथ इस त्योहार को मनाते हैं।

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