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Muharram 2026: आखिर क्यों है मुहर्रम मातम का महीना, कहां से निकला था पहला जुलूस, जानें सब कुछ
- Written By: रीता राय सागर
Muharram: इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी यौम-ए-आशूरा पर हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने कर्बला में शहादत दी थी। जानिए मुहर्रम का इतिहास, ताजिया और जुलूस की परंपरा की

मुहर्रम (फोटो.सोशल मीडिया)
Muharram In India: इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने का नाम मोहर्रम है। मुसलमानों के लिए ये सबसे पवित्र माह होता है। इस महीने से इस्लामिक न्यू ईयर की शुरूआत होती है। मोहर्रम माह के 10वें दिन को रोज-ए-आशुरा कहा जाता है। इसी दिन हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला में अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। इस्लाम में इस दिन को शोक के तौर पर मनाया जाता है।
इमाम हुसैन की शहादत की याद में ही ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं। ताजिया निकालने की परंपरा सिर्फ शिया मुस्लिमों में ही देखी जाती है, जबकि सुन्नी समुदाय के लोग तजियादारी नहीं करते हैं।
भारत में किसने की ताजिया की शुरूआत
मोहर्रम महीने के 10 वें दिन ताजिया निकाले जाते हैं। इराक में बनी इमाम हुसैन की दरगाह से मिलता-जुलता एक ढांचा तैयार किया जाता है, जिसे ताजिया कहा जाता है। इतिहासकारों की मानें तो ताजिया बनाने की परंपरा भारत से शुरू हुई थी। भारत में इसकी शुरुआत तैमूर लंग ने की थी। इस्लाम में मोहर्रम के पहले दिन चांद निकलने के साथ ही ताजिया रखा जाता है। वहीं मोहर्रम के दसवें दिन इसे कर्बला में दफन कर दिया जाता है।
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मुहर्रम (फोटो.सोशल मीडिया)
क्या है मुहर्रम का इतिहास
1400 साल पहले तारीख-ए-इस्लाम में कर्बला की जंग हुई थी। इस जंग में इंसानियत के लिए जुर्म के खिलाफ लड़ाई गई। इस जंग में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथी शहीद हुए थे। मुआविया नाम के शासक के निधन के बाद उसका राजपाट उनके बेटे यजीद को मिली। जीद इस्लाम धर्म का खलीफा बनकर बैठ गया था। वह अपने वर्चस्व को पूरे अरब में फैलाना चाहता था, लेकिन उसके सामने पैगंबर मुहम्मद के खानदान का इकलौता चिराग इमाम हुसैन बड़ी चुनौती थी। कर्बला में सन् 61 हिजरी से यजीद ने अत्याचार बढ़ा दिया, तो बादशाह इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना से इराक के शहर कुफा जाने लगे, लेकिन रास्ते में यजीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान पर इमाम हुसैन के काफिले को रोक लिया।
जिस दिन हुसैन का काफिला कर्बला में ठहरा, वह मुहर्रम का ही दिन था। वहां पानी का एकमात्र स्त्रोत फरात नदी था, जिस पर यजीद की फौज ने मुहर्रम से हुसैन के काफिले पर पानी पीने पर लगा दी। इसके बाद भी इमाम हुसैन झुके नहीं। इतिहास के अनुसार, 80000 की फौज के सामने हुसैन के 72 बहादुरों ने हार नहीं मानी।
मुहर्रम (फोटो.सोशल मीडिया)
उन्होंने अपने नाना और पिता के सिखाए हुए सदाचार, उच्च विचार, अध्यात्म और अल्लाह से बेपनाह मुहब्बत में प्यास, दर्द, भूख और पीड़ा सब पर विजय प्राप्त की। मुहर्रम के 10वें दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका। आखिर में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन खुदा का सजदा कर रहे थे, तब एक यजीदी को लगा की शायद यही सही मौका है हुसैन को मारने का। फिर, उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया, लेकिन इमाम हुसैन तो मर कर भी जिंदा रहे। इस्लाम में उनकी मृत्यु अमर हो गई।
मुहर्रम में भी रखते हैं रोजा
मुहर्रम के इस माह को गम के महीने के तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है। मोहर्रम में कई लोग रोजे रखते हैं। पैगंबर मुहम्मद के नाती की शहादत और कर्बला के शहीदों के बलिदानों को याद किया जाता है। कई लोग इस माह में पहले 10 दिनों के रोजे रखते हैं, जो लोग 10 दिनों के रोजे नहीं रख पाते, वे 9 वें और 10 वें दिन रोजा रखते हैं। इस दिन जगह-जगह पानी और शरबत बांटे जाते हैं, लोग ताजिया और जुलूस निकालते हैं।
Muharram 2026 history of karbala imam hussain martyrdom and tazia procession
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