संतानों की दीर्घायु और समृद्धि के लिए माएं करतीं हैं ‘जीतिया व्रत’, जानिए इस विशेष व्रत से जुड़ी 2 पौराणिक कथाएं
हर साल अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जीवित्पुत्रिका का व्रत किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, जितिया व्रत को करने से संतान दीर्घायु होते हैं और उनपर आने वाला हर संकट टल जाता है। इस व्रत से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है,जिसका सनातन धर्म में बड़ा महत्व है। बता दें, जितिया व्रत को कई जगह जीवित्पुत्रिका और जीउतिया के नाम से भी जाना जाता है। छठ की तरह ही जितिया व्रत का आरंभ भी नहाय-खाय के साथ होता है।
- Written By: सीमा कुमारी
संतानों की दीर्घायु और समृद्धि के लिए माएं करतीं हैं 'जीतिया व्रत', जानिए इस विशेष व्रत से जुड़ी 2 पौराणिक कथाएं
संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए रखा जाने वाला ‘जीवित्पुत्रिका’ (Jitiya Vrat 2024) व्रत सनातन धर्म बड़ा महत्व रखता है। इस वर्ष ये व्रत 25 सितंबर, बुधवार को उतर भारत सहित विभिन्न राज्यों में मनाया जाएगा। जितिया व्रत (Jitiya Vrat) माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, समृद्धि और उन्नत जीवन के लिए रखती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से संतान को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। क्या आप जानते हैं कि जितिया व्रत की शुरुआत कब हुई और कैसे हुई। आइए जानें इस व्रत जुड़ी पौराणिक मान्यताएं और कथाएं-
जितिया व्रत की पहली कथा
पौराणिक मान्यताएं के अनुसार, महाभारत युद्ध में पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत क्रोधित था। वह पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर गया और उसने पांच लोगों की हत्या कर दी। उसे लगा कि उसने पांडवों को मार दिया लेकिन पांडव जिंदा थे। जब पांडव उसके सामने आए तो उसे पता लगा कि वह द्रौपदी के पांच पुत्रों को मार आया है। यह सब देखकर अर्जुन ने क्रोध में अश्वत्थामा को बंदी बनाकर दिव्य मणि छीन ली।
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अश्वत्थामा ने इस बात का बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने की योजना बनाई। उसने गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया, जिससे उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया।
लेकिन उस बच्चे का जन्म लेना बहुत जरूरी था। इसलिए भगवान कृष्ण ने उत्तरा के मृत बालक को फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर जीवत होने की वजह से इस तरह उत्तरा के पुत्र का नाम जीवितपुत्रिका और परीक्षित हुआ। तब से संतान की लंबी आयु के लिए जितिया व्रत किया जाने लगा।
जितिया व्रत दूसरी की कथा
जितिया की कथा के अनुसार, एक बार एक चील और एक मादा लोमड़ी नर्मदा नदी के पास हिमालय के जंगल में रहते थे। दोनों ने कुछ महिलाओं को पूजा करते और उपवास करते देखा और खुद भी इसे करने की कामना की। उपवास के दौरान, लोमड़ी को बहुत भूख लग गयी और वह जाकर चुपके से मरे हुए जानवर को खा लिया।
दूसरी ओर, चील ने पूरे समर्पण के साथ व्रत का पालन किया और उसे पूरा किया। अगले जन्म में दोनों ने मनुष्य रूप में जन्म लिया। चील के कई पुत्र हुए और वह सभी जीवित रहे। लेकिन सियार के पुत्र होकर मर जाते थे। इससे बदले की भावना से उसने चील के बच्चे को कई बार मारने का प्रयास किया लेकिन वह सफल नहीं हो गई। बाद में चील ने सियार को अपने पूर्व जन्म के जितिया व्रत के बारे में बताया। इस व्रत से सियार ने भी संतान सुख प्राप्त किया। इस तरह यह व्रत संतान सुख की प्राप्ति के लिए जगत में प्रसिद्ध हुआ।
