उत्तरायण को क्यों कहते हैं देवताओं का दिन, जानिए इस खास त्योहार के महत्व के बारे में

गुजरात में मकर संक्रांति को उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। इसका धर्म ग्रंथों में खास महत्व होता है वहीं पर इसे देवताओं के दिन के रूप में भी जाना जाता है।
उत्तरायण 2025, गुजरात में मकर संक्रांति
उत्तरायण 2025 (सौ.सोशल मीडिया)
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Uttarayan 2025: नए साल की शुरुआत हो गई है जहां पर जनवरी के इस महीने में मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी मनाया जाने वाला है। इस त्योहार देश के अलग-अलग राज्यों में कई नामों से जाना जाता है और मनाया जाता है। गुजरात में मकर संक्रांति को उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। इसका धर्म ग्रंथों में खास महत्व होता है वहीं पर इसे देवताओं के दिन के रूप में भी जाना जाता है। चलिए जानते है क्या होता है उत्तरायण और इसके पीछे की पौराणिक कथा।

क्या होता है उत्तरायण

यहां पर गुजरात में मकर संक्रांति का नया नाम उत्तरायण होता है। इसका ज्योतिष शास्त्र में उल्लेख है इसके अनुसार, सूर्य हर 30-31 दिन में राशि बदलता है। इस तरह ये 365 दिन में एक राशि क्रम पूरा करता है, इसे सूर्य वर्ष भी कहते हैं। जब सूर्य मकर से मिथुन राशि में रहता है तो इस समय ये पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की ओर गति करता है (भारत उत्तरी गोलार्द्ध में है)। वहीं पर जब सूर्य कर्क से धनु राशि में रहता है तो इस स्थिति को दक्षिणायन कहते हैं। उत्तरायण के दौरान दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं जबकि दक्षिणायन में दिन छोटे और रातें बड़ी होती हैं। सूर्य के प्रकाश अधिक उत्सर्जित करने का फल यह होता है कि, इसके प्रकाश से फसलें ज्यादा पकती है। वहीं पर समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ जाता है वहीं पर यह बारिश में हमें प्राप्त होता है इसलिए ही तो सूर्य का उत्तरी गोलार्ध में आना शुभ फल देता है।

क्या होता है उत्तरायण का देवताओं से संबंध

आपको बताते चलें कि, उत्तरायण को देवताओं से जोड़कर माना जाता है इसमें उत्तरायण को देवताओं का दिन कहते हैं तो दक्षिणायन को देवताओं की रात। इस खास तरह के वैज्ञानिक बदलाव को पॉजिटिविटी का प्रतीक मानते है। इस दौरान सूर्य की रोशनी अधिक समय तक पृथ्वी पर रहती है। मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। इसलिए इस दिन सूर्यदेव की पूजा विशेष रूप से की जाती है। धर्म की खबरें जानने के लिए क्लिक करें 

क्या हैं इसकी पौराणिक कथा

महाभारत के अनुसार, जिस समय कुरुक्षेत्र में पांडवों का युद्ध हुआ, उस समय सूर्य दक्षिणायण था। जब युद्ध समाप्त हो गया और युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो गया, तब सभी पांडवों तीरों पर लेटे भीष्म पितामाह के पास गए। भीष्म ने पांडवों को ज्ञान की कई बातें बताई और सूर्य के उत्तरायण होने के इंतजार करने लगे। सूर्य के उत्तरायण होते ही उन्होंने अपने प्राणों का त्याग कर दिया।

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