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यहां विट्ठल रूप में पूजे जाते हैं भगवान श्रीकृष्‍ण, जानिए पंढरपुर की वारी यात्रा के बारे में

वारी यात्रा का महत्व महाराष्ट्र के लिए बहुत अधिक महत्व रखता है जिसमें लगातार 15 दिन तक लाखों की संख्या में भक्त लाखों भक्‍त संत तुकाराम और संत ज्ञानोबा की चरण पादुकाएं लेकर देहू से पंढरपुर तक की पैदल यात्रा करते हैं।

  • Written By: दीपिका पाल
Updated On: Jul 14, 2024 | 08:06 AM

पंढरपुर की वारी यात्रा (सौ.सोशल मीडिया)

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महाराष्ट्र के पंढरपुर में इन दिनो वारी यात्रा का पर्व चल रहा है जिस मौके पर भक्त भगवान विट्ठल और देवी रूक्मणि के दर्शन करने के लिए हर साल की तरह इस साल भी पहुंचे है। वारी यात्रा का महत्व राज्य के लिए बहुत अधिक महत्व रखता है जिसमें लगातार 15 दिन तक लाखों की संख्या में भक्त लाखों भक्‍त संत तुकाराम और संत ज्ञानोबा की चरण पादुकाएं लेकर देहू से पंढरपुर तक की पैदल यात्रा करते हैं।

यह खास यात्रा की शुरूआत 28 जून से हो चुकी है जो आने वाली आषाढ़ शुक्‍ल एकादशी यानी कि देवशयनी एकादशी 16 जुलाई को पंढरपुर पहुंचेगी। इस यात्रा को लेकर भक्तों में काफी उत्साह देखा जाता है। चलिए जानते है इस यात्रा की शुरुआत और पौराणिक कथा…

जानिए कहां स्थित है पंढरपुर

महाराष्ट्र के प्रमुख तीर्थ स्थलों में पंढरपुर का नाम प्रसिद्ध है जो महाराष्‍ट्र में भीमा नदी के तट पर शोलापुर शहर के पास बसा हुआ है। इसे वारकरी संप्रदाय का स्‍थापना स्‍थल भी कहा जाता है इसकी शुरुआत इस दौरान ही हुई तो वहीं पर इस संप्रदाय के लोग भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विट्ठल के नाम से जानते है औऱ पूजा करते है। इसे लेकर ही हर साल लाखों की संख्या में वारकरी संप्रदाय के लोग विट्ठल-विट्ठल नाम जपते हुए 15 दिन की पैदल यात्रा करते हैं, यह यात्रा देहु से पंढरपुर के बीच निकाली जाती है।

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यह खास यात्रा को 800 सालों से लगातार जारी है। इस खास यात्रा वारी का नाम संप्रदाय से ही जुड़ा है। यात्रा में भक्त भगवान विट्ठल के दर्शन करने के लिए देश के कोने-कोने से पताका-डिंडी लेकर तीर्थस्थल पंढरपुर पहुंचते है। इस यात्रा में भक्‍त देहु से चलकर पुणे और फिर जजूरी होते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं। बता दें, इन्हें ज्ञानदेव माउली की डिंडी के नाम से दिंडी जाना जाता है।संत ज्ञानेश्वर ने वारी का प्रारंभ किया । तब से चली आ रही वारी के कारण पंढरपुर की श्री विठ्ठल की मूर्ति जागृतावस्था में आ गई है ।

जानिए वारी यात्रा से जुड़ी पौराणिक कथा

इस पंढरपुर वारी यात्रा को लेकर पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार,छठवीं सदी में महान संत पुंडलिक थे जो माता-पिता के परम भक्त थे, जो अपने इष्टदेव भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे। एक बार की बात है भगवान श्रीकृष्ण अपने इस अन्य भक्त की आराधना से प्रसन्न हो गए थे उन्होंने पत्‍नी देवी रुकमणी के साथ भक्त पुंडलिक के सामने प्रकट हुए। इस दौरान भगवान श्रीकृष्‍ण ने पुंडलिक को स्नेह से पुकार कर कहा, ‘पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं.’ लेकिन उस दौरान पुंडलिक शयननिद्रा में लीन अपने पिता के पैर दबा रहे थे उनके आराम में बाधा ना आए इसलिए उन्‍होंने भगवान से कहा कि अभी मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए।

इसके बाद वे पुन: अपने पिता के पैर दबाने में लीन हो गए, भगवान ने अपने भक्त की आज्ञा का पालन किया और कमर पर दोनों हाथ धरकर और पैरों को जोड़कर ईंट पर खड़े हो गए। इसके बाद से भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह रूप सामने आया जिसके बाद से इस खास त्योहार की शुरूआत हुई है। इतना ही नहीं यहां पर भगवान श्रीकृष्ण को विट्ठोबा कहते है और पुंडलिकपुर फिर अपभ्रंश रूप में पंढरपुर के नाम से जाना जाने लगा।

Know about wari yatra of pandharpur in maharashtra

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Published On: Jul 14, 2024 | 08:06 AM

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