आम की लकड़ी के चूल्हे पर बनता है खरना का भोग, जानिए क्या होता है प्रसाद में
Chhath Puja Kharna: खरना प्रसाद मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर ही बनाया जाता है। इस प्रसाद को बनाने के लिए अन्य लकड़ी का उपयोग वर्जित है। आइए, इस परंपरा के पीछे छिपे महत्व और वैज्ञानिक कारण
- Written By: सीमा कुमारी
खरना का क्या है महत्व (सौ.सोशल मीडिया)
Chhath Puja Kharna Kab Hai: हर साल छठ पूजा का महापर्व पूरे देश भर बड़े ही श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। खासतौर पर, यह पर्व बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों मनाया जाता है। छठ पूजा का महापर्व आज से शुरू हो गया है।
आज छठ पूजा का पहला दिन है। आज नहाय-खाय है और कल छठ के दूसरे दिन है जिसे खरना कहा जाता है। ये कल मनाया जाने वाला है। खरना के दिन गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाए जाने की परंपरा है।
आपको बता दें, ये प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर ही बनाया जाता है। इतना ही नहीं प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे में लगाने के लिए सिर्फ आम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है। किसी अन्य लकड़ी से यह प्रसाद नहीं बनाया जाता, लेकिन ऐसा करने के पीछे की वजह क्या है? ऐसे में आइए जानते हैं इसके पीछे की परंपरा और धार्मिक कारण।
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खरना का क्या है महत्व
छठ का दूसरा दिन, यानी खरना के दिन का खास महत्व धर्म शास्त्रों में बताया गया है। खरना का अर्थ होता है। ‘शुद्धता’। खरने के दौरान व्रतियों के द्वारा स्वच्छता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है।
अगर मान्यताओं की बात करें तो, खरने के दिन छठी मैया घर में प्रवेश करती है। खरना का दिन पूर्ण रूप से भक्ति और समर्पण का माना जाता है। इस दिन सूर्य देव और छठी मैया का आशीर्वाद मिलता है।
छठ पूजा की प्रसाद बनाने के लिए आम की लकड़ी का उपयोग क्यों
खरना की शाम मिट्टी का चूल्हा बनाया जाता है। इस चूल्हे में आम की लकड़ियां उपयोग की जाती है। हिन्दू धर्म में आम की लकड़ी को शुद्ध और सात्विक मानी जाती है।
मान्यता है कि आम की लकड़ी छठी मैया को बहुत प्रिय है, इसलिए छठ के अवसर पर प्रसाद बनाने के लिए आम की लकड़ियों का उपयोग होता है। इस लकड़ी से प्रसाद बानने पर घर में सकारात्मक उर्जा आती है।
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क्या है खरना की विधि
- खरना के दिन व्रती मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर बनाती है।
- ये खीर पीतल के बर्तन में गुड़, चावल और दूध से तैयार की जाती है।
- साथ ही गेहूं के आटे से बनी रोटी, पूड़ी या ठेकुआ बनाया जाता है।
- इस खीर का भोग छठी मैया को लगता है।
- इसके बाद इसे सभी लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
- फिर 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
