Jagannath Rath Yatra: हर साल नए बनाए जाते हैं प्रभु जगन्नाथ के रथ, जानिए 58 दिनों तक चलने वाली अद्भभुत परंपरा
Lord Jagannath Chariot: भगवान जगन्नाथ का रथ हर साल नए बनाए जाते हैं। जानिए 58 दिनों तक चलने वाली रथ निर्माण की अनोखी परंपरा, जिसमें सैकड़ों कारीगर बिना किसी ब्लूप्रिंट के इन रथों को तैयार करते हैं।
- Written By: रीता राय सागर
जगन्नाथ रथ (फोटो.सोशल मीडिया)
Jagannath Rath Yatra 2026: ओडिशा के पुरी में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 16 जुलाई को है। दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाने वाली विशाल रथ यात्रा के लिए बनाए गए रथों को दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता है। हर साल इस विशेष आयोजन के लिए नए रथों का निर्माण किया जाता है।
लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ में विराजमान होकर गुंडीचा मंदिर तक जाते हैं। खास बात यह है कि इन रथों को हर साल बल्कि हर साल नए सिरे से बनाया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसे आज भी उसी पारंपरिक तरीके से निभाया जाता है।
कब शुरु होती है रथ बनाने की प्रक्रिया
रथ निर्माण की शुरुआत अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर होती है। इसे शुरु करने से पहले जगन्नाथ मंदिर के पुजारी विशेष पूजा और यज्ञ कराते हैं। मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर शुरू किया गया हर कार्य शुभ और फलदायी होता है।
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इन रथों के निर्माण में करीब 200 कारीगर, बढ़ई, लोहार, चित्रकार और दर्जी मिलकर काम करते हैं। इन कारीगरों में कई परिवार ऐसे हैं, जो पीढ़ियों से केवल भगवान जगन्नाथ के रथ बनाने का ही काम करते आ रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इस रथ को बनाने के लिए किसी लिखित नक्शे या आधुनिक ब्लूप्रिंट का सहारा नहीं लिया जाता है, पूरा निर्माण कार्य लगभग 58 दिनों में पूरा किया जाता है।
जगन्नाथ रथ (फोटो.सोशल मीडिया)
ओड़िशा सरकार मुहैया कराती है रथ के लिए लकड़ियां
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए बनने वाले रथों को बनाने के लिए विशेष प्रकार की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी व्यवस्था ओडिशा सरकार की ओर से की जाती है और इन्हें निर्धारित प्रजाति के पेड़ों से प्राप्त किया जाता है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए राज्य में वर्षों पहले विशेष वृक्षारोपण कार्यक्रम भी शुरू किया गया था, ताकि इस परंपरा के लिए आवश्यक लकड़ी की उपलब्धता बनी रहे।
जगन्नाथ रथ (फोटो.सोशल मीडिया)
रथ निर्माण का पहला चरण पहियों से शुरू होता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों रथों में कुल 42 पहिए लगाए जाते हैं। इसके बाद रथों पर नक्काशी, रंगाई और पारंपरिक चित्रकारी की जाती है। लाल, पीले, हरे, काले और नीले रंग के कपड़ों से बने भव्य छत्र इन रथों को विशेष पहचान देते हैं। हर रथ का अपना अलग रंग, आकार और नाम होता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, बलभद्र के रथ को तालध्वज और देवी सुभद्रा के रथ को दर्पदलन कहते हैं।
सिंह द्वार से शुरु होती है रथ यात्रा
रथ यात्रा शुरू होने से एक दिन पहले इन भव्य रथों को जगन्नाथ मंदिर के सिंह द्वार के सामने लाया जाता है। यात्रा के दिन सभी भगवान की प्रतिमा को विशेष विधि से रथों पर विराजमान किया जाता है और हजारों श्रद्धालु रस्सियों से इन रथों को खींचते हुए गुंडीचा मंदिर तक ले जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि रथ की रस्सी को छूना या रथ खींचना अत्यंत पुण्यदायी होता है।
जगन्नाथ रथ (फोटो.सोशल मीडिया)
रथ यात्रा की लकड़ियों का इस्तेमाल रसोई में
रथ यात्रा समाप्त होने के बाद इन रथों को सुरक्षित नहीं रखा जाता, बल्कि परंपरा के अनुसार इन्हें अलग कर दिया जाता है। इनकी लकड़ी का उपयोग श्री जगन्नाथ मंदिर की विशाल रसोई में महाप्रसाद तैयार करने के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक मानी जाती है कि भगवान की सेवा में प्रयुक्त हर वस्तु अंततः फिर से भगवान की सेवा में ही समर्पित हो जाती है।
