होलिका दहन (सौ.सोशल मीडिया)
Holika Dahan Fire Ritual: 3 मार्च को होलिका दहन का त्योहार मनाया जाने वाला है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। होलिका दहन लोगों की गहरी आस्था और विश्वास से भी जुड़ा एक पावन पर्व है। यह केवल लकड़ियां और उपले जलाने की परंपरा नहीं, बल्कि नकारात्मकता पर सकारात्मकता की जीत का प्रतीक माना जाता है।
जब होलिका की अग्नि प्रज्वलित होती है, तो श्रद्धालु मानते हैं कि उनके जीवन के कष्ट, बुरे विचार और नकारात्मक ऊर्जा भी उसी आग में भस्म हो रही हैं। इसलिए कई लोग घर की पुरानी और अनुपयोगी वस्तुओं को प्रतीकात्मक रूप से अग्नि में अर्पित करते हैं, ताकि जीवन में नई शुरुआत हो सके।
होलिका में पुराने समान और उपले अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। जिसका अपना अलग ही महत्व है। मान्यता है कि होलिका की आग में घर के पुराने सामान और उपले अर्पित करने से नकारात्मकता और रोग दूर होते हैं।
घर से क्लेश, बीमारी और दरिद्रता दूर होती है। मानसिक शुद्धि होती है। धार्मिक शास्त्रों में गाय को पूजनीय माना गया है। इसके गोबर पवित्रता का प्रतीक मानकर इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। यही कारण है कि, होलिका दहन में उपले जलाने की परंपरा सदियों से निभाई जा रही है।
होलिका दहन में गोबर के उपले जलाने के पीछे धार्मिक और पारंपरिक दोनों कारण बताए जाते हैं। मान्यता है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है और वातावरण की शुद्धि होती है।
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कहा जाता है कि गोबर के उपलों से निकलने वाला धुआं वातावरण को शुद्ध करने में सहायक होता है। इसी कारण यज्ञ और हवन में भी गाय के गोबर का उपयोग किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से इसे पवित्र और शुद्धि का प्रतीक माना गया है।
ऐसी मान्यता है कि होलिका दहन की अग्नि में गोबर के उपले अर्पित करने से घर-परिवार की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। यही वजह है कि यह परंपरा आज भी श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाती है।