14 सितंबर को हरतालिका तीज, 54 मिनट के शुभ मुहूर्त में होगी शिव-पार्वती की पूजा, बनेंगे दुर्लभ योग

Hartalika Teej Rare Yog: 14 सितंबर को हरतालिका तीज मनाई जाएगी। इस बार पंचमहापुरुष, गजकेसरी और माला योग का शुभ संयोग है। महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखेंगी।
Hartalika Teej Rare Yog Women Fasting
हरतालिका तीज(सोर्सः AI)
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Hartalika Teej Women Fasting On September 14: सोमवार, 14 सितंबर को हरतालिका तीज का पर्व पूरी धार्मिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। पर्व को लेकर बाजारों में पूजन सामग्री, श्रृंगार का सामान और अन्य वस्तुओं की दुकानें सज चुकी हैं।

महिलाएं बाजार में पहुंचकर पूजा से जुड़ी आवश्यक सामग्रियों की जमकर खरीदारी कर रही है। सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए विशेष महत्व रखने वाला यह निर्जला व्रत नारी के अटूट संकल्प, प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष हरतालिका तीज पर पंचमहापुरुष योग, गजकेसरी योग और माला योग का अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है।

इन पावन योगों में भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करने से व्रत का कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने कठोर तपस्या की थी। भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने बालू (रेत) से शिवलिंग बनाकर विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा की और पूरी रात जागरण किया था।

पूजा के शुभ मुहूर्त और विशेष योग

पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर को सुबह 7:24 बजे शुरू होकर 14 सितंबर को सुबह 7:27 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि की मान्यता के कारण हरतालिका तीज का मुख्य व्रत और पूजन 14 सितंबर को किया जाएगा।

प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्तः सुबह 6:05 बजे से 7:01 बजे तक (कुल 54 मिनट)। अभिजीत मुहूर्तः दिन में 11:14 बजे से 12:04 बजे तक। प्रदोष कालः शाम 6:27 बजे से रात्रि तक (इस दौरान पूजा, कथा श्रवण और जागरण करना अत्यंत शुभ माना गया है)।

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पति की लंबी आयु और मनचाहे वर की कामना

माता पार्वती की इस कठोर तपस्या से होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। कथा के अनुसार, माता पार्वती के पिता उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह अन्यत्र तय करना चाहते थे, जिसके बाद उनकी सखियां उन्हें सुरक्षित रूप से घने जंगल में ले गई थीं।

सखियों द्वारा हरण कर ले जाने के कारण ही इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा। इसमें 'हरत' का अर्थ हरण और प्रसन्न'आलिका' का अर्थ सखी होता है। ऐसी मान्यता है कि तभी से सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य जीवन की कामना के साथ यह निर्जला व्रत रखती हैं।

वहीं, कुंवारी कन्याएं भी मनचाहा वर पाने की इच्छा से इस कठिन व्रत का पालन करती हैं। व्रत के दौरान महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, नए वस्त्र पहनती है और हाथों में मेहंदी रचाती हैं।

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