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Harela 2026:16 जुलाई को है उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला, जानें तिथि, परंपरा, महत्व और प्रकृति संरक्षण का संदेश

Harela 2026 Date: हरेला 2026 का लोकपर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा। यह उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपरा, हरियाली और प्रकृति संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। जानें हरेला की सही तिथि और धार्मिक महत्व।

  • Written By: सीमा कुमारी
Updated On: Jul 08, 2026 | 09:34 PM

उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला (सौ.जैमिनी)

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Harela Festival July 16 2026: उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हरेला केवल एक पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती, हरियाली और जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व माना जाता है। सावन के आगमन के साथ मनाया जाने वाला यह उत्सव भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षों से यह पर्व देवभूमि उत्तराखंड की पहचान रहा है और अब इसकी लोकप्रियता देश के अन्य हिस्सों में भी बढ़ती जा रही है।

2026 में हरेला पर्व किस दिन मनाया जाएगा?

वर्ष 2026 में हरेला 16 जुलाई, गुरुवार को मनाया जाएगा। विशेष रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में इस पर्व का अत्यधिक महत्व है। हालांकि अब इसे हरियाली और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े एक प्रेरणादायक उत्सव के रूप में भी देखा जाने लगा है।

हरेला की शुरुआत त्योहार से कई दिन पहले क्यों होती है?

हरेला की सबसे अनोखी परंपरा इसकी पूर्व तैयारी है। इस पर्व की शुरुआत लगभग 10 दिन पहले हो जाती है। घर की महिलाएं और बुजुर्ग मिट्टी के पात्र, डलिया या छोटी टोकरी में पांच, सात या नौ प्रकार के अनाज के बीज बोते हैं।

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इन बीजों पर प्रतिदिन जल का छिड़काव किया जाता है। कुछ दिनों बाद जब इनसे कोमल हरे अंकुर निकल आते हैं, तब इन्हें शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

हरेला के अंकुरों का क्या महत्व माना जाता है?

दसवें दिन तैयार हुए हरे अंकुर परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर रखे जाते हैं और शुभकामनाएं दी जाती हैं। लोकमान्यताओं के अनुसार इससे घर-परिवार में सुख, समृद्धि, अच्छी फसल, लंबी आयु और खुशहाली का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार में एकता, प्रकृति के प्रति सम्मान और कृषि संस्कृति के महत्व को भी दर्शाती है।

भगवान शिव और माता पार्वती से कैसे जुड़ा है हरेला?

हरेला का संबंध खेती के साथ-साथ धार्मिक आस्था से भी माना जाता है। लोक परंपराओं के अनुसार यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन नई शुरुआत, उर्वरता, सुख-समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना की जाती है।
उत्तराखंड की संस्कृति में प्रकृति को ईश्वर का स्वरूप माना गया है। यहां पेड़, पौधे, जल, वर्षा और धरती की पूजा की परंपरा सदियों से चली आ रही है और हरेला उसी सांस्कृतिक सोच का जीवंत उदाहरण है।

अब पर्यावरण संरक्षण का अभियान भी बन चुका है हरेला

समय के साथ हरेला पर्व का स्वरूप और अधिक व्यापक हुआ है। अब इस अवसर पर उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में बड़े स्तर पर पौधारोपण अभियान आयोजित किए जाते हैं। स्कूल, कॉलेज, सरकारी संस्थान, सामाजिक संगठन और स्थानीय लोग मिलकर हजारों पौधे लगाते हैं।
कई परिवारों ने भी इस दिन पूजा के साथ एक पौधा लगाने की परंपरा शुरू कर दी है। उनका मानना है कि वृक्षारोपण भी एक प्रकार का पुण्य कार्य है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य तैयार करता है।

ये भी पढ़ें-  Hariyali Teej 2026: 15 अगस्त को मनाई जाएगी हरियाली तीज, जानें सही तिथि, पूजा-विधि, व्रत के नियम और महत्व

आज के समय में हरेला का संदेश क्यों और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है?

बढ़ते तापमान, बदलते मौसम, घटते जंगल और पर्यावरणीय चुनौतियों के दौर में हरेला का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हरियाली केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।

हरेला हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ वातावरण, बेहतर जलवायु और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकेंगे। यही कारण है कि यह लोकपर्व आज केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और हरियाली का राष्ट्रीय संदेश बनता जा रहा है।

Harela 2026 uttarakhand festival significance

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Published On: Jul 08, 2026 | 09:34 PM

Topics:  

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