Duryodhan and Shri Krishna (Source. Pinterest)
Duryodhan and Shri Krishna During Dharm Yudh: महाभारत का युद्ध केवल शस्त्रों का संघर्ष नहीं था, वह धर्म और अधर्म की निर्णायक लड़ाई थी। अक्सर यह सवाल उठता है अगर दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण से उनकी नारायणी सेना के बजाय स्वयं श्रीकृष्ण का साथ मांगा होता, तो क्या परिणाम बदल जाता? क्या कौरव विजय प्राप्त कर लेते? यह प्रश्न जितना रोचक है, उतना ही गूढ़ भी।
पहले यह समझना जरूरी है कि श्रीकृष्ण का पक्ष क्या था। अर्जुन और दुर्योधन के लिए दो पक्ष थे कौरव और पांडव। लेकिन श्रीकृष्ण के लिए केवल एक ही पक्ष था धर्म। उन्होंने स्वयं शस्त्र न उठाने का वचन दिया था, परंतु यह स्पष्ट था कि वे धर्म की स्थापना के लिए ही उपस्थित थे। यदि दुर्योधन उन्हें अपने पक्ष में मांग भी लेता, तो भी श्रीकृष्ण धर्म के विरुद्ध खड़े नहीं हो सकते थे। अर्थात, वे जहां भी होते, विजय अंततः धर्म की ही होती और उस समय धर्म पांडवों के साथ था।
पुराणों और रामायण में भी ऐसे प्रसंग मिलते हैं। प्रजापति दक्ष नारायण के भक्त थे और उन्हें संरक्षण का वचन मिला था। लेकिन जब उन्होंने भगवान शिव का अपमान किया और माता सती ने यज्ञ अग्नि में देह त्यागी, तब स्थिति बदल गई। विष्णु भगवान ने औपचारिक रूप से दक्ष का साथ दिया, परंतु अंततः विजय धर्म की ही हुई। रामायण में अश्वमेध यज्ञ के दौरान एक शिवभक्त राजा ने घोड़ा पकड़ लिया। शिव जी उसके पक्ष में थे, फिर भी अंतिम विजय श्रीराम और धर्म की हुई। इसी प्रकार बाणासुर और श्रीकृष्ण के युद्ध में भी धर्म की स्थापना ही अंतिम परिणाम बनी।
यदि हम स्वयं को युद्ध से ठीक पहले के समय में रखें, तो पांडवों की स्थिति कमजोर दिखती है। कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी, जबकि पांडवों के पास केवल 7। भीष्म, द्रोणाचार्य और कवच-कुंडलधारी कर्ण जैसे महायोद्धा कौरव पक्ष में थे। ऐसे में सामान्य बुद्धि कहती है कि कौरवों की विजय निश्चित थी। परंतु हुआ इसके विपरीत। श्रीकृष्ण ने बिना शस्त्र उठाए धर्म की जीत सुनिश्चित की।
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मेरे मत में, यदि दुर्योधन श्रीकृष्ण को अपने पक्ष में भी मांग लेता, तो भी परिणाम नहीं बदलता। श्रीकृष्ण किसी न किसी उपाय से धर्म की ही विजय कराते। ईश्वर की लीला मानव बुद्धि से परे है। महाभारत हमें यही सिखाता है कि अंततः जीत उसी की होती है जो धर्म के मार्ग पर चलता है।