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गुरु प्रदोष व्रत की पूजा बिना इस कथा के मानी जाती है अधूरी, आप भी करें पाठ और पाएं शिव-पार्वती की कृपा

Guru Pradosh Vrat: गुरुवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन शिव-पार्वती जी की पूजा करने के साथ ही इस व्रत कथा का पाठ करना लाभकारी होता है।

  • Written By: रीता राय सागर
Updated On: May 28, 2026 | 07:21 AM

गुरू प्रदोष व्रत कथा (फोटो.सोशल मीडिया)

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Guru Pradosh Vrat Katha: हिंदू कैलेंडर के अनुसार, साल 2026 में ज्येष्ठ माह के अधिक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर गुरु प्रदोष व्रत मनाया जाता है। इस दिन भक्ति भाव से पूजा करने से भगवान शिव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

भगवान शिव व माता पार्वती को समर्पित इस पूजन को करने से गृहस्थ जीवन में सुख-शांति, धन-वैभव के साथ ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।

गुरु प्रदोष व्रत 2026: शुभ मुहूर्त

त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 28 मई 2026 को सुबह 07 बजकर 56 मिनट पर होगी।

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तिथि का समापन 29 मई 2026 को सुबह 09 बजकर 50 मिनट बजे होगा।

प्रदोष पूजा के लिए 28 मई को शुभ मुहूर्त शाम 07 बजकर 12 मिनट बजे से रात 09 बजकर 15 बजे तक रहेगा।

गुरू प्रदोष व्रत (फोटो.सोशल मीडिया)

गुरु प्रदोष व्रत की कथा

एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना के बीच युद्ध हुआ। देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित किया। यह देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित हुआ और आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया। सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहुंचें।
वृत्रासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने गन्धमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया। पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया। वहां शिव जी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहास पूर्वक बोला- हे प्रभु, मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं।
चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिव शंकर हंसकर बोले- हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है। मैंने मृत्यु दाता काल कूट महा विष का पान किया है, फिर भी तुम साधारण जन की भांति मेरा उपहास उड़ाते हो। माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ से बोली- अरे दुष्ट, तूने सर्वव्यापी महेश्‍वर के साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है। मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा, अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं।

जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्रासुर बना। गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले- वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिव भक्त रहा है। अतः हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर शंकर भगवान को प्रसन्न करो। देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इन्द्र ने शीघ्र ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शान्ति छा गई।

ये भी पढ़ें- Guru Pradosh Vrat:अधिकमास का पहला प्रदोष व्रत गुरुवार को, विधिवत पूजा से महादेव की बरसेगी कृपा

गुरु प्रदोष व्रत की पूजन विधि

इस दिन भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और भगवान शिव परिवार की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद घी का दीपक जलाकर पूजा में फूल, माला, सूखे मेवे और मिठाई अर्पित की जाती है। शाम के समय गौधूलि बेला में प्रदोष पूजा की जाती है। भक्त प्रदोष व्रत कथा, पंचाक्षरी मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं। पूजा के बाद परिवार के सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोलते हैं।

Guru pradosh vrat 2026 katha or puja vidhi kar mahadev ka ashirwad paye

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Published On: May 28, 2026 | 07:21 AM

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